Canto 9

Category
SB 9.4.68

Studying Bhagavatam Daily Destroys Crores of Sins

Year
Location
Rajkot
Category
SB 9.10.53

Lord Rama is our Supreme Protector

Year
Location
Antwerp
Category
SB 9.4.41

Do not Make a Mockery of your Bhakti (Hindi)

Year
Location
Surat
Transcription

Please scroll down to find the English translation of this lecture. Hare Krishna. 

और वेद में से कुछ भी आप ले लीजिए, तो वो हमें ज्ञान दे देंगे। वैसे ही अनेक श्लोक है श्रीमद्भागवतम् मे,भगवद्गीता में इसलिए भगवद्गीता तो सम्पूर्ण कण्ठस्थ करनी ही चाहिए। आप शुरु करें प्लीज़, 10 वे अध्याय से चतुर्श्लोकी भगवद्गीता पहले आनी चाहिए । 10-वे अध्याय में श्लोक न0 8,9,10 और 11 ये चार में सारी भगवद्गीता आ गई। तो पहले ये चार श्लोक तो आने ही चाहिए। और 4 हो जाए तो, हम भक्तियोग कर रहे हैं - तो भक्तियोग के बारे में कृष्ण जी क्या कहते हैं? इसलिए 12 अध्याय 20 श्लोक का है ,छोटे से छोटा है, वो सम्पूर्ण कण्ठस्थ चाहिए। ये वेद हैं। फिर भक्तियोग का हो जाए, तो कृष्ण जी के बारे में भगवान स्वय॔ क्या कह रहे है स्वतः, स्वतः के बारे में? ये 15-वे अध्याय मे है। वो भी 20 श्लोक ही हैं, तो प्लीज़ कम से कम इतना 40 श्लोक दो अध्याय के और 4 श्लोक चतुर्श्लोकी 44 श्लोक तो बिल्कुल हमारे पास चाहिए हमेशा। क्योंकि हमने कपड़े बदल के रखे हैं,तो जो भी हमे देखता है, उसे यह पता नही है कि ये 6 महीने से ही है। हम न्यू हो , नए हों, पर हमारा वो स्वरूप देखकर यह मान लेता है कि यह तो बड़ा ज्ञानी है, भक्त है, और सवाल पूछ लेता है। और हमारे मुँह से ऐसे वाक्य निकलते हैं, वो मर जाता है। क्योंकि हमने कुछ किया ही नहीं है। तो प्लीज़ एक श्लोक है बड़ा अच्छा ना जार जातस्य ललाट श्रृंगं 

ना जार जातस्य ललाट श्रृंगं  कुले प्रसूतस्य ना पाणि पद्मम्

दो बातें पहली लाइन में कही गई है हम समझें बात "यदा यदा मुञ्चति वाक्य बाणं ", वाक्य बाण जो हमारे मुँह से निकले "मुञ्चति" वो वाक्य बाण छोड़ रहा है। "तीर" नही बाण जो खींच के छोड़ते हैं, वैसे ही वाक्य बाण  "तदा तदा  जाति कुलप्रमाणम्"।

तो उसकी जाति पता चल जाती है। चुप बैठा होता है, तो मूर्ख भी बड़ा सुन्दर दिखता है। तो हमें ऐसा लगता है कि कितना ज्ञानी है, बिल्कुल शांत बैठा है। ये महाशय जाकर चुप बैठ जाते हैं, खड़े ही नही होते। वो एक life member कहता है "कि भई आता है, जाता ही नही (लाफ्टर) और बोलता भी नही." क्योकि बोलने का कुछ है ही नही उसके पास (लाफ्टर) तो नही बोलें, जब तक हमारा मान रह जाता है, बोलना शुरू करें तो "खत्म"। तो देखिए इसमें पहली लाइन में कहा है कि "ना जार जातस्य ललाट श्रृंगं" यानि कोई वैश्या का पुत्र हो तो उसके सिर पर कोई सींग नहीं होते, कि भई यह वैश्या का पुत्र है। ऐसे कोई अलग नहीं होता वो "ललाट श्रृंगं" ललाट यानि कपाल और उसके ऊपर श्रृंग, उसके ऊपर सींग, तो उसको पहचाना नही जाता वो कि यह कुल्टा स्त्री का पुत्र है।"ना जार जातस्य ललाट श्रृंगं " "ना" नहीं ,कोई सींग नही है और "कुले प्रसूतस्य ना पाणि पद्मम्" और अच्छे कुल का हो लड़का या लड़की तो उसके "पाणि" यानि हाथ में कोई lotus flower नहीं होता। कोई चिह्न नहीं होता कि बड़ा अच्छा, अच्छी family का है । फिर कैसे पहचाना जाए ? "यदा यदा मुञ्चति वाक्य बाणं" जब वह मुँह खोलता है, तो पता चल जाता है कि कौन है, जार जातस्य है, या कुले प्रसूतस्य है। ये वाक्य जो हमारे मुँह से निकले वो हमेशा अच्छे होने चाहिए I और अच्छे कैसे हों ? कि जो वेद बोल रहा हो । प्रभुपाद जी ने इतना हज़म किया था। He digested the whole Bhagavatam and whole Bhagavadgita and all vedic literature that's why he could write thousands and thousands of purports and very nice.  ये purport में एक भी शब्द कम नही कर सकते हम, और एक ज्यादा add भी नहीं कर सकते इतना कैसे? And he was grhastha, so many years, he was a businessman. कहां से उन्होंने assimilate किया होगा ।और यह सारी life का काम हैI गृहस्थ होना कोई बड़ी बात नहीं है, किंतु too much attachment of grhastha is very bad. कृष्ण भी बहुत बड़े गृहस्थ थे। हम तो एक wife लेकर बैठे हैं। कृष्ण तो 16000 के हैं। कितना बड़ा गृहस्थ, पर उनको देखकर हम सन्यास ले लेते हैं। That is real गृहस्थ।

अम्बरीश महाराज कितने बड़े राजा थे। सारे गोले के राजा थे। और वह गृहस्थ थे, और उन्होंने कितना करके बताया है।यह है it is point to be under stood कि भई; हम इतना ये already मैंने कहा आपको कि हम already ऐसे atmosphere में हैं, कि यहां हमने यह करना चाहिए। और यदि हम यह करें तो हमारे मुंह से यही निकले, और कोई मन में विचार हो तो मुंह से वही निकलेगा। मुंह से कब निकलता है वाक्य, कि पहले जब हम सोच करते हैं, और उसके बाद इसकी क्रिया ऐसे हैं, कि पहले हृदय में स्फूर्ण हो, ये स्फूर्णता " स्फूर्ण "शब्द समझते हो न? ह्रदय में स्फूर्णता - कोइ बोलता नहीं है। ये ब्रह्मा के हृदय में भगवान ने भी हृदय टू हृदय ज्ञान दिया था। उसको कोई स्लेट लेकर बैठना नहीं पड़ा था। या कोई बड़ी high school नहीं, कि कोई B.A या M.A या कोई टीचर नहीं। यह हृदय से आया। हृदय का जो माध्यम होता है वह भगवान का माध्यम होता है जब  हृदय - हृदय टू होता है, तो उसमें बोलने की आवश्यकता नहीं होती, यह ऐसे हैं। प्रभुपाद को आप लेकर बैठो तो आपके हृदय में स्फूर्णता ****  यह कोई मस्तिष्क का ज्ञान नहीं है ।यह जो mind का  जो ज्ञान है , वह तो यह science है विज्ञान है ,और क्या नहीं है , you know computer है। यह सब मस्तिष्क का ज्ञान है। मस्तिष्क का जो ज्ञान होता है इसमें speculation आ जाता है। और हम बड़े अभिमानी हो जाते हैं कि मैं L.L.B हूं ,मैं B.com. हूं, chartered accountant हूं, मैं Dr. हूं, यह आपको intoxicate कर देता है। इसको तीन शब्द भागवतम् में use किए हैं, "मत्तम" - पहला शब्द है "मत्तम" यानी "मूर्ख" साधारण मूर्ख ही होता है इसको "मत्तम " कहते हैं। फिर दूसरा है "प्रमत्तम" कोई intoxicated हो जाता है, कि मेरी कितनी अच्छी पत्नी है, कितने अच्छे बच्चे हैं, मेरा मकान  कितना अच्छा है, मेरा बिजनेस बहुत अच्छा है। यह intoxication है। यह मद आ जाता है। और नहीं ,यह जिनको कुछ नहीं होता है, उनको दारू पीनी पड़ती है, फिर वह दारू के मद में आ जाते हैं। और मद में आ जाए, तो कैसे भी बोलने लगता है यह प्रमत्त आदमी जो होता है, उसके बोलने में कोई अर्थ नहीं होता। क्योंकि वह खुद की स्तुति करता है, "मैंने ऐसा किया, मैंने आज ऐसा किया "।

फिर हमारा कड़िया, कड़िया समझते हो ना? गुजराती समझता है न? कड़िया - क्या मतलब है? गुजरात में बैठा है, खिचड़ी में बात करता है। गुजराती सीखो! कड़िया किसको बोलते हैं?

(भक्त:पता नहीं महाराज)

(मिमिकरीःपता नहीं महाराज) गुजरात में बैठा है, खाली खिचड़ी खाता है इसको कुछ ये नहीं ! यह कौन बोलेगा ? "कड़िया" बोलो आप बोलो

(भक्त: मकान repair करता है )

मकान repairing नहीं, बनाता है सीमेंट जो लगाता है। कल आप भी सीमेंट लगाने लग जाओ, तो कड़ियां हो जाओ। तो हमारे यह कड़ियां हैं और बहुत ***  है जाड़ा है, आपसे भी डबल हैं, और काम बिल्कुल कम करता है। उसको दो औरतें,  तो वो दो औरतें भी साथ चाहिए उसको काम में। तो एक उसका 150 रुपए रोज या 250 रुपए रोज*****जो भी है

( भक्त :  ?)

यहां क्या चलता है ? (लाफ्टर ) रोज तो मार देते हो। तो दो औरतें उसको साथ चाहिए। 90-90 रुपए औरतों के और ढाई सौ रुपया इसका, कितना हुआ? मैंने कहा कि, "भई तू मुझे आधा ही दे मैं सारा दिन सीमेंट लगाता हूं " (लाफ्टर)  "नहीं नहीं बोले, कि मेरा काम तो इतना बढ़िया है कि.."  यह  "प्रमत्तम" - इंटॉक्सिकेशन, काम से । काम कुछ करता नहीं ,पर बातें (लाफ्टर) mimicry और आठ आदमी रखें और शाम को जाए तो 25 पत्थर भी जमाया नहीं।मैंने कहा कि, "भई 8 आदमी क्या करते हो ?" वह बोला, "पत्थर तो उठा कर देखो"I मैंने कहा, "मेरे को उठाना होता, तो मैं 8 आदमी काहे को लगाता?"  (लाफ्टर) "प्रमत्तम "कहते हैं। ऐसे लोग आते हैं, जो खुद की ही प्रशंसा करते हैं, इसको प्रमत्तम कहते हैं। और इसके बाद तीसरी कक्षा आती है, उसको भागवतम् में हम, "उन्मत्तं" कहते हैं। उन्मत्तं, प्रमत्तम और मत्तमI 

(Maharaj greeting the Deities and lovingly talking with Them) "जय, जय श्री राधा दामोदर जी की जय" - हमारे को खिचड़ी देते रहो भई।

जो उन्मत्तं रहता है वो insane होता है, अँग्रेजी में उसको insane कहते हैं वो पागल होता है, मूर्ख- मूर्ख होता है ।दूसरा intoxicated थोड़ी देर उसको मद होता है । मगर यह जो उन्मत्तं होता है वह तो insane, बिल्कुल पागल हो जाता है।और यह पगलाई जो करते हैं लोग, तो देखे, आपने देखे होंगे वो रास्ते पर चलते ऊँगलियाँ ऐसे ऐसे करते हैं ।उसको सोच आता है कि मैं overseer था। मैं कैसे order कर रहा था लोगों को, "ये इधर रख दो, ये उधर उठा कर रख दो।" उसने जो काम किया है न , वह सब उसको याद आता है।और वह याद आता है - शक्ति निकल जाती है, टाइम चले जाता है। टाइम हमेशा हमारे पर काम करता है। और हमारे दिमाग में वह लाइने रह जाती हैं कि हमने ऐसा किया, ऐसा किया। यह सब बर्बादी की निशानी है। मत्तम बर्बादी है, प्रमत्तम उससे ज्यादा बर्बादी है ,और बहुत सुप्रीम बर्बादी जो है वह फुल मत्तम। तो यह तीन से हम बचे। तो इसको कहते हैं कि, "यदा यदा मुञ्चति वाक्य बाणं " -  हमारे जो शब्द निकले, उसमें से वेद ही निकले और कुछ न निकले

अम्बरीश महाराज ने हमें बताया, जिनकी चर्चा हम कर रहे हैं। उन्होंने इतना बड़ा सत्तावान आदमी होने के बाद भी, इन्होंने शपथ ली थी कि मैं भगवान के सिवा और कुछ नहीं बोलूंगा। और आपको अनुभव होगा कि जो दूसरे काम होते हैं न, वह थोड़ी देर में हो जाते हैं। यह जो दूसरे काम हम करते हैं, मैंने कुछ करना है, कुछ लाना है, कुछ लगाना है, कुछ रखना है, कुछ बेचना है, कुछ लेना है। यह सब हम कर रहे हैं, सभी। किंतु इसको इतना टाइम नहीं लगता। और फिर भी हम यहां देखिए घंटा डेढ़ घंटा के लिए आराम से बैठ जाते हैं। किंतु बिल्कुल जो दुकान के मय हो जाता है, या फैक्ट्री के मय हो जाता है, तो कृष्णमय होना उसको आता नहीं। हमें कृष्णमय होना है, और दूसरी बातें तो हमें नहीं। नहीं जैसे टाइम में हम कर लेते हैं ।इतना बड़ा मकान हो रहा है ,चल रहा है ,आ ही रहा है ऊपर, जब से हमने देखा है यह नीचे नहीं जा रहा है , ऊपर ही आ रहा है। तो यह होता है और यह एक दिन हो ही जाएगा पूरा। थोड़ा बहुत प्रयत्न हमें इधर-उधर करना पड़े that's it ज्यादा नहीं ।तो कोई प्राइवेट आदमी मकान करें तो दीवाना हो जाएगा ।एक तो उसको लक्ष्मी जमाना पड़े और बाद में यह कड़ियां , यह मजदूर और यह और वह कांट्रेक्टर सब उसका लहू चूस लें ।और वो मकान पूरा करता है ,जब तक वह बिल्कुल पागल हो जाए, बिल्कुल पागल हो जाए। यह युग बहुत खराब है। क्यों ? क्योंकि यह जो मकान है वह भगवान के सिवा, यह कृष्ण के सामने revolution है। कृष्ण ने हमारे को यह मकान में रहने का कहा नहीं है।क्या है वह ? "यमुना तीर वनचारी कुंज बिहारी" - क्या हम गाते हैं ?क्या है लास्ट लाइन ?

(भक्त ) "कुंज बिहारी गोपीजन बल्लभ गिरिवर्धारी "

यह "यमुना तीर वनचारी" - इसको यह मकान क्यों है? क्योंकि यह कुंजबिहारी है। या तो यह जंगल में रहता है, नहीं तो यह बहुत बड़े palatial building में रहता है।यह दो ही बातें हैं। इसको यह झोपड़ी, यह छोटा मकान - यह इसको चलता नहीं। यह इसका वर्णन है। तो इसको जो मकान बनते हैं, यह palatial बनते हैं। और यह बनाता है।हम कुछ नहीं करते यह जो इसका मकान है, यह सब हम उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि हम इसके family member हैं। कोई नाम लेता है, हमारे यहां भी, कोई नौकर ऐसा रख ले हम, जो बहुत intimate हो, सेवा करता हो, तो नौकर एक family member के जैसा हो जाता है। और वो जिंदगी निकाल देता है। उसको दवाई, उसको करना, उसको रखना, यह सब हमारी responsibility होती है। वैसे हम जब इसके पीछे पड़ते हैं तो हम इसके बहुत वफादार नौकर हो जाते हैं। और वफादार नौकर हो जाए ,तो इसकी responsibility होती है, कि भई यह बीमार न रहे, इसको कपड़े मिलते रहे, इसको रोज खाना मिलता रहे, प्रसाद मिलता रहे। ये सब ये व्यवस्थित करता है हम कुछ नहीं करते, देखिए हम यहां आए हैं, और प्रसाद ले रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हम यहां नहीं आते तो मर जाते?  प्रसाद - जब तक भगवान को हमें जिंदा रखना है, तब तक प्रसाद कहीं ना कहीं है ही। यहां आए तो यहां है ,और कहीं जाए तो और कहीं, कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था है। हम "प्रमत्त" तो हो जाते हैं, "insane" और जब "insanity" आती है, पगलाई जब आती है, तो हम यह मानना शुरू कर देते हैं कि मैं इसको प्रसाद दे रहा हूं इसलिए यह जिंदा है। यह " insane"I "sanity" - तो यह है की प्रसाद देने वाला वह है, हम निमित्त मात्र हैं।"निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्" (B.G-11.33) यह अर्जुन को कहता है कि, "मैंने इन लोगों को सबको मार कर रखा है, तू खाली निमित्त हो जायह तेरे बिना भी, यह मुर्दे ही हैं।" यह भगवान की अंतर्शक्ति होती है।

और जब अर्जुन ने कहा कि, "भगवान मुझे मेरे सैन्य देखने हैं, दोनो पक्ष के, जिनके साथ में लड़ रहा हूं।" क्योंकि अर्जुन - "insane" था, पागल था। उसने ऐसे मान लिया कि, "मैं लड़ रहा हूं, और मैं मारने वाला हूं।" इसके लिए उसने कहा कि, "यह सब मेरे सगे- संबंधी है, इनको मुझे मारना नहीं है। तो मैं बैठ जाता हूं ,गान्डीव छोड़ देता हूं ।इससे तो भीख मांग लूंगा वह अच्छा है।" तो भगवान ने इसको यही समझाया है कि तू पागल है कि जो ऐसा मान रहा है कि तू कर रहा है ये। हम भी ,हमारी insanity जब बढ़ जाती है, हमारी पगलाई जब बढ़ जाती है, तो हम यह मानना शुरू कर देते हैं कि 25 आदमी है - इनको मैं खिला रहा हूं। यह insanity है, sanity जब आती है, तो समझदारी होती है। इसको समंजस कहते हैं। समंजस्ता तो यह है कि सारा काम ये कर रहा है। मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। यह बात समझ जाएँ तो sanity। इसमें फिर प्रमत्तम हम कभी नहीं होते। हमेशा हम नम्र रहे,

तृणादपि सुनिचेन, तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन, कीर्त्तनीय: सदा हरि:।। 

तो यह बात जब होती है, तो हमें यह पानी और उपवास का भी समझ आता है। जो हम इसमें से समझे हैं कल। इतना समझने के बाद अब हम देखे।अब अम्बरीश महाराज ने पानी पी लिया और दुर्वासा बहुत बड़ा mystic है। यह जो भी है बहुत शक्तिवान योगी है। और यह शंकर का अवतार है। तो शंकर भगवान का अवतार होने से इसको क्रोध भी बहुत था। और छोटी-छोटी बातों पर यह क्रोध कर देता था। क्रोधी आदमी यदि सामान्य जन हो, शंकर की बात अलग है। शंकर जो करते हैं वह हम कर नहीं सकते। शंकर के जो भक्त हैं वह ऐसा कहते हैं कि, "भई मैं शंकर का भक्त हूं ,मैं बड़ा क्रोधी हूं"I अरे भई, तो क्रोध तूने शंकर से ले लिया, शंकर ने जो ज़हर पिया है वह तू नहीं लेता? "मैं शंकर भक्त हूंI जरा ज़हर भी दे दो" । तो हमारे को जो अच्छा लगता है वह ले लेते हैं हम, और जो नहीं कर सकते वह छोड़ देते हैं। तो ऐसा नहीं करना चाहिएमहान पुरुषों का आप अनुकरण न करें। जैसा वह कर रहे हैं वैसा न करें। किंतु इनको सुने। शंकर ने इतना बड़ा ज्ञान दिया है वो हम बाजू में रख देते हैं, और चिलम लेकर जो उसके धुएँ में देखते हैं कि शंकर मेरा दिख रहा है। यह हिमालय में बहुत बैठे हैं। तो यह बात जब समझ जाते हैं हम, तो अम्बरीश की बात हमें समझ में आ जाती है, कि वैष्णव होने से यह नम्र है, बहुत नम्र है ये। नहीं तो राजा, इतना बड़ा राजा होने के बाद दुर्वासा कोई चीज नहीं थी उसके सामने। दुर्वासा ने क्रोध किया तो पकड़वा कर के जेल में डाल देता, तो दुर्वासा चूँ चूँ करते हुए कहीं बैठा रहता। यह कर सकता था यह, किंतु नहीं, यह वैष्णव का काम नहींI नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति मदभ्क्ता : प्रभवोऽपि हि ।। - S.B-1.18.48)

यह भागवत का शिक्षण है "नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति ", किसी ने कुछ भी हानि, हमारे को की तो, "नास्य तत् प्रतिकुर्वन्ति" - हम प्रतिकार नहीं करते, we do not counteract and last line में, इसने कहा है कि, "मदभ्क्ता: प्रभवोऽपि हि" - मेरे भक्त प्रभावशाली हो, शक्तिशाली भी हो, तो भी कभी प्रतिकार नहीं करते । अम्बरीश महाराज संपूर्ण शक्तिशाली थे। किंतु भागवतम् को इन्होंने पचाया था कि "नातस्य तत् प्रतिकुर्वन्ति"। हम कोइ बात का प्रतिकार नहीं करते। यह बात जब समझ जाते हैं हम, और समझ कर जब इसका realization होता है, तो practical life में, हम इसको उतार लेते हैं। और practical life में यह शिक्षा न उतारो तो आपका यहां रहना बिल्कुल निकम्मा है। इससे बेहतर है कि आप चले जाएं। जो भी करना है, शादी करना है करें, एक करे, दो करें चार करें, और हमको बुलाएँ, कथा कीर्तन करने के लिए आएँगे आपके यहाँ। और पैसे तैयार रखें बंडल ,पाँच-पाँच सौ का ,ले लेंगे। क्या बात है कब करनी है शादी बोल? बोल दे ,बोलते जाओ।(लाफ्टर)

यह बात है ,देखिए यदि यहां रहना है हमें और हम यह atmosphere में हैं। तो यह हजम कर लीजिए और यह हजम करने के बाद, जीवन बदल दीजिएI नहीं तो इसका कोई उपयोग नहीं। ये सब sense gratification हो जाता है। "ये बड़ा अच्छा बोला***" - साउथ इंडिया में एक बहुत बड़ा स्वामी था। उसका बहुत बड़े हाॅल में लेक्चर था। तो बहुत बड़े-बड़े लोग वहां सुनने के लिए आते और बाहर निकल कर, "Swamiji talks so nicely, so nice, so nice" - तो उसको किसी ने पूछा,"What was nice about?  कि "भई अच्छा क्या था ?" "No,No. Swamiji speaks so high that we could not understand."  (लाफ्टर)  तो यह हमारे प्रभुपाद की रीत नहीं है। प्रभुपाद ऐसे बिठाकर, उंगलियां बराबर बता कर इनको बराबर समझा देते थे। कि "भई ऐसा करो, ऐसा करो।" नहीं तो, इन लोगों को तो खाने का पता नहीं था। यह तो कुत्ते के जैसे कहीं सैंडविच तोड़ लेते थे। और कहीं सो जाते थे, और कहीं उठते थे, तो नहाते नहीं थे। और क्या कर रहे हैं, इनको पता नहीं था। इनको सब बातें बताईं कि, "ऐसा करना, ऐसा करना।"  यह भागवत है। खाली इन्होंने यह lecture नहीं दिएI यह विशेषता है प्रभुपाद जी की। और जिसने प्रभुपाद के साथ रहना पसंद किया है, उसका सब जीवन बदल जाता है। और जीवन यदि बदले तो आपके चेहरे पर वह दिखता है। क्योंकि हमारी आत्मा की प्रभा, इसको भागवतम् मे प्रभा कहते हैं ।आत्मा हमारा परमात्मा का अंश है, कृष्ण का अंश है। " ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: " (B.G-15.7)  आत्मा अंश है, तो अंश होने से अंशी के जो गुण है वह इसमें भी हैं। कृष्ण effulgence - बहुत प्रकाशवानI कोई लाखों सूर्य को जमा करें हम, तो इनके प्रकाश का कोई comparison नहीं है। तो यदि आप कृष्ण के साथ बैठे हो, कृष्ण आपके मन में बस रहा है, रात दिन हम कृष्ण का संग लेकर बैठे हैं तो उसकी यह प्रभा भी तो हमारे शरीर में आनी ही चाहिए। हमारा मुँह सुधर जाना चाहिए। जिससे हम बिल्कुल सिंपल हो जाएं

बहुत सादगी हो, कोई अटक ना हो। इसलिए हम चाय नहीं लेते, कॉफी नहीं लेते कि, "हमारे को वो ही चाहिए, वो ही चाहिए"। "यह चाहिए-चाहिए", हमने खाने पीने के बारे में atleast निकाल दिया है। जो होता है प्रसाद ,वह हमारे सामने आ जाए, जो भी दो निवाले हो, हम खा लेते हैं, जो भी देता हो खा ले। यह जो हमने किया है यह हमारे जीवन में अंतर आया है। वैसे यह कृष्ण की जो प्रभा है, इसको hamper ना करें। इसको अटकाए न, और इसको कैसे हम अटकाते हैं? कि यहां बैठे-बैठे भी हम लोभी भी हो जाते हैं, कि मुझे यह चाहिए। मुझे यह करना है। मुझे वह करना है। उससे यह प्रभा अटक जाती है। यहां बैठे-बैठे भी हमारे मन में विचार बुरे आते हैं। बुरे विचारों का काम होने से, यह प्रभा अटक जाती है। यहां बैठे-बैठे भी, कलयुग का वरदान है - हम आलसी हो जाते हैं।  तो आलसी हो जाने के बाद भी यह प्रभा अटक जाती है ।और इसलिए ब्रह्म मुहूर्त में कभी हम न सोएँ। इतनी फिक्र हमारे को करनी चाहिए। यहां हो या और कहीं हो , 4:00 बजे के बाद हम कभी ना सोएँ।  हमारा स्नान और प्रातः कर्म ,यह सब अंधेरे में हो जाना चाहिए। यह उजाला कभी ना निकले, उस वक्त। यह भागवत की रीत है, और यह होगा तो जो प्रभा है आपकी, वह प्रभा बराबर प्रकाशित होगी। नहीं तो चेहरे पर सभी दिख जाता है।  हम क्या सोच रहे हैं ।हम कैसे जीवन बिता रहे हैं ।यह हमारा चेहरा आईना है। हम बोले नहीं, पर चेहरा सब सच बात बता देता है। हमारे भक्त लोग you know, marriage भी करते हैं, लग्न करते हैं। तो हम उनसे बात पूछें?  कि भाई ,"कैसा है गृहस्थ जीवन? "How is your life?"  तो बोलता है, "since l have married, l am very happy" - जोर से बोलता है, "l am very happy*******"  तो वह मुंह से कहता है, "मैं बड़ा हैप्पी हूं ,बड़ा हैप्पी हूं ", पर उसका चेहरा देखो तो और कुछ दिखता है।(लाफ्टर ) तो प्लीज कैसे वैसे करें, sincerety रखें। हम already बहुत भाग्यवान है, कि हम यहां आ गए हैं। अब देखें। आज का श्लोक देखें। बोलिए प्रेम से

 ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय । ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय । ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय। (पुनरावृत्ति )

इति अप: प्राश्य राजर्षि चिन्तयन् मनसा अच्युतम्
प्रत्यचष्ट  कुरूश्रेष्ठ द्विज-आगमनम् एव सः

(पुनरावृत्ति)  

यह दो लाइन का श्लोक है।अनुष्टुप छंद हैI भगवद्गीता के छंद में है, सिंपल है | (तीन बार भक्त दोहराते हैं, महाराज जी के साथ)  

इत्यपः प्राश्य राजर्षि  चिन्तयन् मनसाच्युतम्
प्रत्यचष्ट कुरूश्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः।।

बराबर पढ़कर पूरा उच्चार करो। पूरा उच्चार नहीं करते आप, उच्चार पूरा करो बराबर। बोलो: "इति अपः प्राश्य राजर्षि" (पुनरावृत्ति - भक्त)

नहीं, देखिए , "चिन्तयन" स्पष्ट करो  "चिन्तयन् मनसाच्युतम्" (पुनरावृत्ति) (भक्त) नहीं नहीं आप पढ़ते हो बराबर, आप हिंदी पढ़ लेते हो, हिंदी पढ़ते हो न? बराबर पढ़ो"  प्रत्यचष्ट "(पुनरावृत्ति) "कुरूश्रेष्ठ" (पुनरावृत्ति ) (भक्त) 

"द्विजागमनम" द्विजा -द्विजा "ज" नहीं है। "द्विजा-गमनम एव सः" जल्दी बोलता है "जा" नहीं बोलता  "जा ऽ ऽ ऽ " बोलो  "जा ऽऽऽ " द्विजा (पुनरावृत्ति ) "द्विजागमनम् एव सः" बोलो  (भक्त ) "एव सः "। हम उच्चार करें बराबर । महाशय (भक्त) आपके उच्चार अच्छे हैं। From which side are you coming? Are you from India? Which part of India?

(भक्त -उड़ीसा )

अच्छे हैं उच्चार। अभ्यास करना चाहिए। (भक्त दोहराते हैं: "इति अपः प्राश्य  राजर्षि चिन्तयन् मनसाच्युतम्। प्रत्यचष्ट कुरूश्रेष्ठ द्विजागमनम् एव सः ")  ये accountant है? पहले 500 का बंडल, यहां 500 के नोट का चाहिए। बाद में दूसरा श्लोक गाएँगे। ये accountant है न? क्या बाहर काम करता है? या यही काम करता है ? हँ ! क्या काम करता है ? बाहर जाता है? क्यों ये। Anyway - देखिए आप learn करेंगे please "इति - thus", "अपः-water",  प्राश्य- after drinking ,"राजर्षि -The great king  Ambrish"  देखिए एक लाइन है यह। चार लाइन का श्लोक है, और हर एक लाइन में 8-8 अक्षर है। अनुष्टुप छंद हो तो एक लाइन में 8 अक्षर होते हैं  । पहले, पहली लाइन है " इति, इति ,प्राश्य 4 और राजर्षि यह आठ हो जाते हैं ।  एक लाइन में 8 अक्षर, सारे श्लोक में 32 अक्षर होते हैं। यह श्रीमद्भागवतम इतना sophisticated शास्त्र है कि इसमें अक्षर -अक्षर गिना हुआ है। शब्द की तो बात छोड़िए, वाक्य की बात छोड़िए, आप यह श्लोकों की बात छोड़िए, किंतु हर एक अक्षर गिना हुआ है। इतना sophisticated literature दुनिया में कोई धर्म में नहीं है। दूसरे जो कहलाते हैं धर्म - इसमें कोई धर्म में, हर एक अक्षर गिना हुआ नहीं है। इतना यह व्यास भगवान ने बहुत ही, incarnation, literary incarnation कहिए। यह कृष्ण के अवतार थे लिखने के लिए और इसीलिए इनका जो लिखान है इसकी कोई comparison दुनिया में नहीं है। ऐसे श्रीमद् भागवत को छोड़कर हम कौन से साहित्य के पीछे पड़े हैं?  

इसीलिए प्रभुपाद जी ने क्या किया कि स्वयं अपने जीवन में उतार कर हमें यह सिखाया है। इन्होंने जब इनको जरा भी विचार नहीं था कि परदेस जाएंगे, जब राधा दामोदर temple में रहते थे ये, और इन्होंने सन्यास लेने के बाद यह निश्चय किया कि मेरे गुरु महाराज ने मुझे English speaking world को यह सिखाने का बोला है तो मैं यह करूंगा कि श्रीमद्भागवतम अंग्रेजी में translate करूंगा। यह पहली ***   और आखिर तक यह करते रहे। मृत्यु के पधारी पर भी इन्होंने यही किया। यह प्रभुपाद जी ने हमें सिखाया है। जीवन में इतना महत्व इन्होंने श्रीमद्भागवतम् को दिया है कि रोज यह 1:00 बजे जग जाते थे क्यों? क्योंकि इन्हें पता था यहां से हर एक अक्षर गिना हुआ है। और यह इतने ,इतने इसमें गड़े -पड़े थे प्रभुपाद जी, कि हर एक शब्द का अर्थ, नहीं तो संस्कृत में अनेक अर्थ होते हैं एक शब्द के। किंतु जो बराबर बैठता है अर्थ वही दिया। और यह बहुत बार हमें कहते थे कि" मुझे है न आप यह administrative duty से मुझे free कर दो। क्योंकि इनके सामने nearly hundred temples हो गए थे। तो hundred temples में यही जानकार थे। और तो सब बिल्कुल अनगढ़ थे। इनको तो पता ही नहीं कुछ। तो इनको सब, सब व्यवहार इनको ही देखना पड़ता था। तो administration में इतना काम करना पड़ता था कि इन्हें रात को समय नहीं मिलता था translation के लिए , तो हमेशा ये विनती करते थे कि भाई कैसे-वैसे करो आप, जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ।  

और एक बार यह सिडनी में, इन्होंने राधा कृष्ण के डेटीज़ ले जाने का तय किया, कि भई सिडनी में मंदिर चाहिए। तो वहां राधा कृष्ण की स्थापना होनी थी। तो जब सब हो गया तो एक मकान ले लिया वहाँ। अभी भी मन्दिर वही है। तो राधा कृष्ण के डेटीज़, बहुत बड़े डेटीज़ को ले जाएं - तो उसको transport का बहुत बड़ा problem था। तो इन्होंने खाली डेढ़ फुट की मूर्ति कृष्ण जी की, राधा जी की, तो ऐसे ही लैप पर रखकर ले गए। वे एरोप्लेन में अपनी गोद में रख कर ले गए। और वहां ले जाने के बाद इन्होंने स्थापना की उनकी। अभी वही डेटीज़ है और ऐसे ऊँचा-ऊँचा आॅल्टर किया हुआ है और आॅल्टर के ऊपर वही छोटे-छोटे डेटीज़ हैं, जैसे हम घर पर रखते हैं वैसे ही डेटीज़। बाद में इनको समय ही नहीं था कि उनको ट्रेन्ड करें, कि इनको वस्त्र कैसे पहनाएँ जाएं, कैसे इन को साफ किया जाए, क्या सेवा की जाए?| तो इन्होंने एक छोटी किताब थी पूजा के बारे में, वो  president को दे दी, और भगवान के पास जाकर प्रार्थना की, कि "भई क्षमा करें मुझे, आप ही नहीं मुझे बहुत काम दिया है । मुझे यहां रह कर ये बंदरों को ट्रेन्ड करने का टाइम नहीं है। आप ही इनको ट्रेन्ड कर लीजिए , और आपकी पूजा आपही करवा लीजिए।" (लाफ्टर) ऐसे करके वो  दूसरे दिन वहां से निकल गए। और अभी  वो बहुत अच्छी पूजा वहां चल रही है। जब से प्रभुपाद जी बहुत कम गए ऑस्ट्रेलिया, तो ये तो highest type of worship हैI और हमारे यहां तो worship कुछ भी नहीं।  इतनी first class worship, westerners कर रहे हैं। हम उनके तीन आॅल्टर देखें, चक्कर आकर हम नीचे गिर जाएं ऐसे ऑल्टर है। ये लोग बहुत careful हैं। इनसे हमें यह सीखना चाहिए  कि cleanliness कितना रखें। इनको वैसे अच्छा ही नहीं लगता। इनके स्वभाव में है यह कसेंगे बिल्कुल clean कर देंगे tip-top, काम की चीज हुई उतना ही रखेंगे । ये जो अच्छे गुण है न, यह हमें लेकर और हमारे श्रीमद्भागवतम् के ज्ञान के साथ यह उतार लेने चाहिए।

तो जब भागवतम् का श्लोक हमारे सामने आता है, तो रोज हम एक श्लोक करते हैं यहां। तो इसको word by word समझिएI इसके शब्द समझ लीजिए। Traslation में जाने की बहुत गड़बड़ न करें। थोड़ा समय रखें। यदि आपको समय ना हो, तो जरा जल्दी भागवतम् क्लास शुरु कर दें। तो जिससे हम समझ सके। तो देखिए, एक लाइन में यहां 1, 2, 3, 4 शब्द है और चार शब्द हम easily याद कर सकते हैं। यह 4 शब्दों में एक - दो शब्द तो, हमारी भाषा के ही होते हैं। तो हमारे लिए यह बहुत सुविधा है कि अंग्रेजों को, या कोई forieģner को, हमारी भाषा का ज्ञान नहीं होता है। तो इनको ज्यादा प्रयत्न करना पड़ता है। किंतु हम थोड़ा प्रयत्न करें तो हमें समझ में आ जाता है। देखिए "इति "यानी इस प्रकार। "इति" का मतलब होता है।"अपः" यानी पानी। पानी को अपः कहते हैं। "प्राश्य" यानी पीकर इसको "प्राश्य" कहते हैं और "राजर्षि" हम जानते हैं वो राजा ही नहीं थे, ऋषि भी थे। ऋषि होता है पहले, राजा होने से पहले इनको तपस्चर्या के लिए भेजा जाता था।  

प्रचेता है, तो प्रचेता के पिता, प्राचीनबर्हि बहुत बड़े राजा थे। तो उनको पता था कि 8 प्रचेता जो है, यह मेरे बाद राज्य करने वाले हैं। तो इनको पहले इन्होंने जंगल में भेज दिया, कि जाओ और जहां कहीं भी कोई संत महात्मा मिलेगा, उससे आप शिक्षा लो। और वह जैसा कहेगा - वैसे तपस्चर्या करो। और बाद में आ जाओ। तो इनको शिव भगवान मिल गए। तो शिव भगवान ने कहा कि "कहां जा रहे हो?" तो इन्होंने कहा तपस्चर्या करने। "काहे की तपस्या" बोले पता नहीं। "कहां जा रहे हो, कहां बैठने वाले हो, कुछ पता नहीं। कब कितनी देर करने वाले हो। कुछ पता नहीं"। अरे भई! कुछ पता नहीं, और तू जा तो रहा है"। तो बोले "मगर आप कौन"? "बोले शिव भगवान" अच्छा तो भगवान हो आप, तो हमें बताओ कैसे करना है?" (लाफ्टर) तो उनसे उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और पानी के अंदर, तापी के अंदर जाकर हजारों सालों तक उन्होंने तपस्या की थी। हमारा मतलब यह नहीं है कि कल सुबह वहां जाकर बैठ जाएं। तो life member का पैसा आना बंद हो जाएगा। ये नहीं है किंतु "penance" चाहिए

ताप चाहिए जीवन में, और आज महान तप यह है। कलयुग में महान तप यह है कि हम 16 माला बराबर करें। यह बहुत महान तप है। हम सब का जानते नहीं है, पर स्वयं हम हमारा ध्यान नहीं देते की हमने 16 माला की है। एक हमारा एम्स्टर्डम में हम थे, तो वहां एक गंगाधर करके president था। You know तो मैं गया, तो बोले, "बहुत अच्छाI l am very busy Maharaj." तो मैंने कहा कि तू काम तो कुछ नहीं कर रहा है, काहे में बिजी है? तो कहा कि "l have to chant nine thousand eighteen rounds yet. मैने कहा "9 हज़ार 18 काहे के लिए?" "Daily l keep an account, if l can't chant. Then l keep the account of not chanted rounds." रोज 16 करना है, तो कभी चार करता है, तो कभी दो करता है। तो 14 बाकी रह गया। तो ऐसे करके, वो add करके, वो 9 हज़ार और 18 (लाफ्टर) तो मैंने कहा, "what are you doing?"  तो  "l am sorry."  तो मैंने कहा, "you just go for a week and chant your rounds and then come." (laughter) There is nobody...दो-तीन भक्त हैं छोटा सेंटर है ऑस्ट्रेलिया में अभी। तो वो तो, बेचारा अभी अकाउंट रखता था। हम तो अकाउंट भी नहीं रखते (लाॅफ्टर) वो बेचारा इतना तो करता था कि मेरे को 9 हजार 18 चैन्ट करने हैं। हम तो दिन गया, भूल गए, "ऐ ऐ ऐ"। और हम कृष्ण के पास जाएं वो भी "ऐं ऐं ऐं"।(लाॅफ्टर) "ये यथा मां प्रपद्यन्ते " (लाफ्टर ) तो प्लीज यह महान तपस्चर्या करें कि 16 राउंड बराबर करें। और इतने हो जाएं भाग्य से, तो भगवद्गीता और भागवतम्।और इतना भाग्य से हो जाए, तो सेवा का काम, सेवा भी तो करनी है ।तो यह सब तपस्चर्या है। यहां तापी के अंदर जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं तो आपका address बदल जाएगा, under the bed of तापी You know. तो वो postman वहां आएगा नहीं, ऊपर ही डाल देगा चिट्ठी*****। तो प्लीज, यह तपस्चर्या करनी है। यदि हम न करें, और न समझे तो, कौन समझेगा? हम नहीं करेंगे, तो नहीं होगा। शिक्षा कोई आपको देगा कि, "भई ऐसा करना है, ऐसा करना है।" अंग्रेजी में बड़ा अच्छा कहते हैं कि, "you can take the horse to the bank of the river, घोड़े को तापी के किनारे ले आते हैं, but you cannot force it to drink water." उसका मुंह हम डाल नहीं सकते कि "पी"I No. वह ऐसा हो जाएगा। उसको पीना है, तो ही पिएगा। तो प्लीज, ऐसे घोड़ा ना हो, जो पानी के किनारे पर खड़ा है और पानी नहीं पी रहा है। हम ऐसे घोड़े हैं जो पानी के किनारे हैं, पानी नहीं पीना चाहते हैं। तो प्लीज ऐसे समझेI

देखिए, बोलिए "इति" (भक्त दोहराते हैं) "अपः" भक्त दोहराते हैं "प्राश्य" भक्त दोहराते हैं "राजर्षि" भक्त दोहराते हैं। और समझ में आ गया? इस प्रकार "पानी" (पुनरावृत्ति) पीया (पुनरावृत्ति) "राजर्षि" ने (पुनरावृत्ति) और ऋषि कहलाते थे वो, मैंने कहा आपको कि राजा होने से पहले ऋषि। ध्रुव महाराज भी राजा होना चाहते थे किंतु 6 महीने पहले माता ने उनको कड़वे वचन कहे थे, तो छोड़कर सब चले गए और वहां austerity बहुत की थी ध्रुव महाराज ने।यह सब जो प्रसंग है, श्रीमद्भागवतम् के, यह हमारा, हमने समझ कर जीवन में उतारना है। इसमें जो रुकावट आती है, ये तपस्चर्या मे जो रुकावट आती है, वह बहुत समझ के साथ दूर करनी है, इसको कलयुग कहते हैं ।कलयुग में रुकावटें बहुत आएंगी।और ज्यादा ज्यादा रुकावट हमारे मन की होती है। मन कहता है - उसको भागवतम में "दीर्घ सूत्री" कहते हैं "कि यह flower garland यहां पड़ा है, यह यहां नहीं रहना चाहिए। तो यह निकालकर, जहां इसका स्थान हो, वहां रखना है I तो हम क्या करते हैं की 25 जन यहां से जाएंगे और वह देखेंगे कि flower garland पड़ा हैI "अरे ये किसने रखा है? यहां क्यों रखा है?" बोल कर चले जाएंगेI फिर दूसरा आएगा, "अरे flower garland यहां जाने दो इसको*** "और वह भी चला जाएगा। तीसरा आया - "अरे काम करते हो कि नहीं आप? यह यहां क्यों पड़ा है? देखो जरा," कोई उठा कर रखेगा नहीं। और 25 -"हम सेवा कर रहे हैं, हम सेवा कर रहे हैं " अरे क्या?! ये जो - और नहीं तो कोई ऐसा आएगा कि, "भई यह garland यहां पड़ा है कल रख दूंगा। आज तो ऐसे ही रहने दो।" ऐसे यह दीर्घ सूत्री ।जो अभी काम होने जैसा है - एक सेकंड में जो काम होने जैसा है, उसे कल पर हम डाल देते हैं। "आज कहे मैं काल भजूँ , काल कहे फिर काल," - ये भजन का जो काम है -

आज कहे मैं काल भजूँ काल कहे फिर काल
आज काल के करत ही जांसी अवसर चार।I

बोलिए "इति "(भक्त दोहरातेहैं) "अपः" (भक्त दोहराते हैं) "प्राश्य" (भक्त दोहराते हैं) "राजर्षि " (भक्त दोहराते हैं )। ये हमारे को पक्का हो गया। देखिए" इति"(पुनरावृत्ति) "अपः" (पुनरावृत्ति) "प्राश्य" (पुनरावृत्ति)  "राजर्षि"  राजर्षि ने इस प्रकार पानी पीया। कितना, कितना आसान है। Is there any difficulty? अरे क्यों भई ! पैसा देने में क्या हर्ज है? यह हमने समझा दिया तेरे को कि "nothing is free".,.. न बँटे। मुफ्त में नहीं मिलता है कुछ?, तो जाकर दो बंडल तैयार करके रख। ऐसे दो बंडल दे दे। (लाफ्टर) और ये भांग जैसे रखी है न, वैसे आप भी जरा ऐसे कर लेना। (लाफ्टर) ये शिष्य है इसके, सब भांग रखने वाले हैं (लाफ्टर) सब भांग वाले शिष्य हैं।

तो समझ गए न आप? फिर दूसरी लाइन है "चिन्तयन्" अब वो सोचने लगे।"मनसा" मन से सोचने लगे। कितना आसान है, देखिए - "चिन्तयन्" (पुनरावृत्ति) "मनसा" (पुनरावृत्ति) "अच्युतम "(पुनरावृत्ति) मन में कृष्ण के बारे में सोचने लगे। इन्होंने पानी पी लिया वो काम हो गया। उपवास टूट गया and "चिन्तयन् मनसा अच्युत्तम्" यह इनसे सीखना है कि आप यह सेवा कर लो। किंतु "मनसा अच्युत्तम् "चिन्तयन्" - चिंता हमेशा thinking. "चिन्तयन्" यानी thinking. बोलिए "चिन्तयन्" यानि meditating upon मनसा  "by the mind" अच्युतम - The Supreme Personality of Godhead. ये तो पहली लाइन से भी बहुत आसान है। अब यह दो लाइने आ गई हमें।

बोलिए "इति "(पुनरावृत्ति) "अपः"(भक्त) Very good" प्राश्य राजर्षि" चोर है, सब चोर है। क्यों यह चोरों को लेकर बैठे हैं? चोर हैं। इधर देख रहे हैं।उधर देख रहे हैं। मैंने सोचा कि आपको आ गया।

"इति अपः प्राश्य राजर्षि " चिन्तयन्(पुनरावृत्ति) मनसा (पुनरावृत्ति) अच्युत्तम" कितना आसान है? Is it very difficult? कोई मुश्किल है? भई! ये खिचड़ी खाना भी मुश्किल है। इससे भी आसान है, क्योंकि खाना ही हमारा स्वभाव नहीं है। क्योंकि उसको चबाना पड़ता है, बनाना पड़ता है। कोई cook करेगा, फिर हमारे सामने आएगा। फिर हम खाएंगे, फिर जो बर्तन रहेगा, उसको धोएंगे। वो खिचड़ी का बर्तन भी कोई साफ करेगा। यह बहुत कष्ट है। इसमें इतना भी कष्ट नहीं है।

"इति" (पुनरावृत्ति)" अपः" (पुनरावृत्ति) "प्राश्य"(पुनरावृत्ति)"राजर्षि"(पुनरावृत्ति)"चिन्तयन्"(पुनरावृत्ति)"मनसा"(पुनरावृत्ति)"अच्युत्तम्"(पुनरावृत्ति)  यह एक विचार हो गया इसमे दो लाइन में , कि भई उन्होंने पानी पिया। वो राजर्षि - ये बहुत कम, शब्द बहुत कम हैI किंतु ocean of knowledge is squeezed. इसमें बहुत बड़ा ज्ञान भरा हुआ है। "इति" (पुनरावृत्ति) "अपः" (पुनरावृत्ति) "प्राश्य" (पुनरावृत्ति) "राजर्षि" (पुनरावृत्ति) "चिन्तयन्" (पुनरावृत्ति) "मनसा" (पुनरावृत्ति) "अच्युत्तम्"। अब इससे हमने क्या सीखना है कि हम भी जो काम करते हैं, खाना-पीना करते है, कपड़े धोते है, स्नान करते है, या और कोई भी सेवा करते है, तो "चिन्तयन् मनसाच्युत्तम्"I ये तीन शब्द हमेशा याद रखें। ये कभी न भूलें। बोलिए (भक्त-दोहराते है) (महाराज जी भी दोहराते है।)  हाँ ,That's right very good. आ गयाI  पैन्ट-शर्ट को आ जाए, तो धोती को न आए? बोलो.

(भक्तः इति अपः प्राश्य राजर्षि  चिन्तयन् मनसाच्युत्तम् )

महाराज जीः Very good.

भक्तः इति अपः प्राश्य राजर्षि  चिन्तयन् मनसाच्युत्तम्

महाराज जीः Very good पंडित है ये ।

भक्तः पुनरावृत्ति

महाराज जी: कभी भूलना नहीं है *** यहाँ आकर मIरूँगा मैं अगर भूल जाओगे तो।

भक्त: पुनरावृत्ति

महाराज जी: जय ,बोलिए       

भक्तः पुनरावृत्ति

 इति" (पुनरावृत्ति) "अपः" (पुनरावृत्ति) "प्राश्य" (पुनरावृत्ति) "राजर्षि" (पुनरावृत्ति) "चिन्तयन" (पुनरावृत्ति) मन में (पुनरावृत्ति) "मनसा " (पुनरावृत्ति) किसको?

"अच्युतम " (भक्त)

Very good. खिचड़ी बना दी आपने।Yes बिल्कुल नहीं? खाता है यह? ऐसे करके न चले। एक शब्द बोल!

भक्तः  हँ

भक्त: यह गौड़ीय मठ में था I

महाराज जी: गौड़ीय मठ में यह नहीं है?

(भक्त ) हां जी I

महाराज जी: यह ऐसा नहीं है।गौड़ीय मठ क्या है? Only भजन करना है, वह भी अच्छा है पर थोड़ा बहुत यह भी कर लो। अब यह गौड़ीय मठ नहीं है। प्रभुपाद जी की जगह है। तो This way,this is to be learnt. और हमें यह तीन शब्द, आप याद रखो न कि, "चिन्तयन मनसा अच्युतम " - कुछ भी हम करें - "चिन्तयन मनसा अच्युतम" बोलो "चिन्तयन (पुनरावृत्ति) मनसा (पुनरावृत्ति) अच्युतम (पुनरावृत्ति)" चिन्तयन  यानी सोचना मनसा - मनसे अच्युतम - कृष्ण। कृष्ण को हमेशा याद करना। ध्यान कृष्ण का करना है।  हम अनेक बातों का ध्यान करते हैं। रुपए का ध्यान करते हैं, कोई लड़की का ध्यान करते हैं, या कोई business का ध्यान करते हैं, कोई मकान का ध्यान करते हैं, कोई और कोई ध्यान करते हैं। तो भागवतम यह कहता है कि "चिन्तयन मनसाच्युत्तम्"। यह दो लाइन तो पक्की हो गई। This is how we should study continuously और इसमें कोई मुश्किल नहीं है, खाली एक बात है की you must have some time and peaceful mind. यह शांत दिमाग हो हमारा और थोड़ा समय हो, और इसमें डालिएगा। यह आपकी capital हो। Capital को हिंदी में क्या कहते हैं? (भक्त) हाँ ! यह पूंजी है हमारी। और पूंजी हो, तो business होगा। पूंजी के बिना business कैसे होगा? आपके पास पूंजी तो चाहिए!

ये कपड़ा, ये आपने रखा है "हरे-कृष्ण" का। लोग देखते हैं कि, "भई यह साधु है, यह जानता होगा सब।" तो वाक्य जब निकलते हैं, तो लोग भाग जाते हैं। ऐसा न हो । इतना याद रखो, कि भई आप कछ भी करो - "चिन्तयन मनसाच्युत्तम" एक शब्द, एक वाक्य बोलो तो लोगों को पता चलेगा - "अरे यह तो बहुत कुछ जानता है!" May be आप को ये तीन शब्द ही याद है। मगर जो आते हैं वही बोलिए। "अरे भाई ऐसा करें -" चिन्तयन मनसा अच्युतम" कुछ भी करें आप, भागवतम ने यह कहा है - "चिन्तयन मनसा अच्युतम" कि भई चिन्तन हमेशा मन में भगवान का करो! तो यह महान शिक्षा है। महान शिक्षा है लोगों के लिए। और लोगों  के कान पर जब भागवतम पड़ेगा तो उनको भी बहुत आनंद हो जाएगा। क्योंकि यह Non different from Krishnaहै, यह कृष्ण से भिन्न नहीं है। तो आप लोगो को कृष्ण दे रहे हो और बहुत बड़ा पुण्य का काम। और जब दोगे तब दोगे, आप तो ले लो ! तो आप तो Blissful हो जाओ।

तो कृष्ण जहां हैं ,वहां संपूर्ण ज्ञान और आनंद यह दोनों भी चीजें होती हैं।यह कृष्ण का स्वभाव है। प्रभुपाद जी हमेशा उदाहरण देते थे कि "आग हो, तो गर्मी और प्रकाश दोनों होने ही चाहिए।" गर्मी और प्रकाश को आग से जुदा नहीं कर सकते। वैसे जहां आत्मा है, वहां ज्ञान और आनंद knowledge and bliss - यह आनंद का translation लिख दिया। bliss शब्द याद रखो आप। Knowledge चाहिए और blissful - बहुत संतोष से आनंद हो जाए, यह दो चीजें हमारे आत्मा के साथ ही, और इसको हम अलग नहीं कर सकते, इसलिए भागवतम् कहता है कि आपको knowledge चाहिए, आप को ज्ञान चाहिए, और आपके जीवन में प्रसन्नता चाहिए। कभी केले के जैसा मुंह करके मत बैठो, मुंह हो तो तरबूज के जैसा, यह देखो इसका तरबूज, ऐसे हँसता है, तो जैसे तरबूज हंस रहा है। क्योंकि प्रसन्न और प्रसन्न प्रकृति हो क्यों? क्यों प्रसन्न है ? The root, इसका मूल, प्रसन्नता का मूल ये  हैI "चिन्तयन् मनसा अच्युत्तम " - यह मूल है I तो यह इसमें से शिक्षा है।

 फिर आगे देखिए तीसरी लाइन - "प्रति अचष्ट" बोलो  "प्रति" (पुनरावृत्ति) "अचष्ट" (पुनरावृत्ति) began to wait - ये  यह राह देखने लगे। पानी पिया,"राजर्षि" ने पानी पी लिया" इति अपः प्राश्य राजर्षि चिन्तयन मनसाच्युत्तम - भगवान का ध्यान करने लगे। और वो मेहमान जो नहाने के लिए गए हैं, उनकी राह देखने के लिए, "प्रत्यचष्टा" देखिए, How it is nice? एक शब्द हमें तीसरी लाइन में भी आ गया। और कौन राह देखता था? "कुरुश्रेष्ठ" - किसको कह रहे हैं ये? वह, Oh best of the Kuru king, शुकदेव गोस्वामी, भागवतम, परीक्षित महाराज को सुना रहे हैं। और परीक्षित महाराज को यहां कुरुश्रेष्ठ कहा है। ये कौरवों में श्रेष्ठ था और इसकी बढ़ाई कौन सी थी? क्यों यह बड़ा था कौरवों में? क्योंकि इनका नाम दूसरा विष्णुरात है। जब यह उत्तरा, इनकी मां, के पेट में थे तो अश्वत्थामा ने, द्रोणाचार्य के पुत्र ने, अग्नि अस्त्र छोड़ा था, इनके लिए nuclear weapon और अभी nuclear weapon जो है, इतने वो प्रगति वाले नहीं है। पर पहले जो पांडवों के पास जो weapon थे, वो जिसके लिए छोड़ते थे, वही मरता थाI दूसरा कोई नहीं। अब तो छोड़ने वाला भी मर जाता है, तो इसलिए वो छोड़ते ही नहीं। नहीं तो Nuclear war हो जाए, तो इसको मारना हो, तो मैं छोड़ दूं।पर उसको मारना हो तो मुझे भी मरना है। तो बोला, "छोड़ उसको भी जीने दो, मै भी जी रहा हूँ"। ऐसा करके वो war होती नहीं। और दूसरी एक बात हुई है दुनिया में, कि last तीस साल से, करोड़ों ग्रंथ हमारे वितरण हुए हैं, हर एक भाषा में। यह बहुत बड़ा ढक्कन है, बैठ गया war के ऊपर । क्योंकि थोड़े बहुत लोग हैं कि जिनका मन यह पैसे में नहीं रहा है, देश में नहीं रहा है, जमीनों में नहीं रहा है, कहीं नहीं रहा है। और उन्होंने यह जान लिया है कि यह सब दो दिन का मेला है और यह सब जाने वाला है इसलिए war होती नहीं है। कभी कहीं कुछ थोड़ा बहुत हो जाता है, इससे ज्यादा कुछ होता नहीं है।यह प्रभुपाद का Effect है। प्रभुपाद ने जाने-अनजाने बहुत महान, महान कार्य इनके द्वारा कृष्ण ने करवा दिया है।प्लीज हमारे जीवन में भी संघर्ष न रहे कभी संघर्ष न रहे ,इसको कलि कहते हैं । जो आपने 25 साल से मिलाया होगा आध्यात्मिक शक्ति, वह 2 दिन की कला में खत्म हो जाएगी यह इतना बुरा है कभी ना आने दे।

इसलिए इसको "कुरुश्रेष्ठ" कहते हैं, क्योंकि इसका रक्षण माता के पेट में विष्णु ने घूम कर किया है। और वो वर्णन बहुत अच्छा है कि अंगूठे के जितने हैं, और परीक्षित महाराज ने इनका दर्शन, ये माता के उदर में किया था। इसलिए जब वो, जन्म हुआ इनका। यह तो जल गए थे already. तो इन को जिंदा रखने वाले भगवान थे। और यह परीक्षित महाराज को ही नहीं ,किंतु हमारी भी दशा वही है। माता के पेट में हम नौ महीने पड़े रहते हैं। और जब सात महीने का गर्भ हो जाता है, तो इसको "भावना" - चेतना आती है, यह समझने लगता है। तो जब इसको स्पर्श होता है, इसको brain इसका विकास हो जाता है। जब यह बड़ा, बच्चे के जैसा हो जाता है, तो इसको पता लगता है कि, "मैं मल-मूत्र में पड़ा हूं। मेरे को विष्ठा भी गरम, मूत्र भी गरम। मूत्र हमारा गर्म हो, तो बहुत तकलीफ होती हैI तो उससे हमारे को, ये तो हमारा शरीर, ऐसी तो थी नही, चमड़ी बिल्कुल कोमल थी चमड़ी। तो वह चमड़ी गर्म मल-मूत्र को सह नहीं सकती। और ब्लड ,पस और क्या-कैसे हम जिंदा हैं, पता नहीं? या तो माता ने मर जाना था, या हमने मर जाना था। ये तो भगवान की माया है कि माता भी जिंदा होती है, और बच्चा भी। यह भागवतम् में जो वर्णन है, हम पढ़ते हैं तो दूसरी बार जन्म लेने की मर्जी बिल्कुल नहीं होगी। यह इतना कष्ट है कि दोनों ही मर जाने चाहिए। नहीं तो एक ने तो जरूर मर जाना चाहिए। क्योंकि यह सहा नहीं जाता कष्ट। और इतना कष्ट लेकर हम यहां आए हैं और "हैं -हैं हूँ-हूँ", करके टाइम निकाल देते हैं। और जैसा आए, वैसा कोरा चले जाते हैं। तो फिर और 84 लाख योनि में गिर जाता है। इसको इसलिए कुरुश्रेष्ठ कहा है।

और तीसरी लाइन में दो ही शब्द है। ये क्या है पहला - "प्रति अचष्ट" यानी राह देखने लगे। फिर "कुरुश्रेष्ठ" यानी परीक्षित महाराज। अम्बरीश महाराजा ने पानी प्राशन किया। पीने को यह "प्राशन" शब्द बहुत अच्छा है। पानी प्राशन किया - यह भागवतम् का शब्द है।और पानी प्राशन करने के बाद, भगवान के ध्यान में लग गए। "चिन्तयन मनसा अच्युतम" और "प्रत्यचष्ट" और ध्यान करते करते ये "कुरूश्रेष्ठ" ये परीक्षित (Ambarish) महाराजा ये राह देखने लगे कि दुर्वासा कब आता है? क्योंकि दुर्वासा आए तो इसके साथ हम प्रसाद ले।

और चौथी लाइन में हम जाते हैं। तो देखिए ऐसे समझने की रीत है। तो तीन लाइन तो हमें आ गई, नहीं! बोलो,पहली लाइन बोलो (भक्त दोहराते हैं)

Very good very good "प्रति अचष्टा" " कुरुश्रेष्ठ" - बस आ गई।देखिए 3 लाइन हो गई ।बोलिए:

(भक्त पुनरावृति )

"प्रतिअचष्ट"हँ बस हो गया। अब चौथी लाइन में आ रहे हैं हम, तो श्लोक पूरा हो जाए। तो ऐसे शांति से करोगे न, तो श्लोक थोड़ा बहुत आपको आ जाएगा ।और बाद में क्या करना है आपने कि, यह श्लोक कागज में लिख लेना है और फिर सारा दिन उसने देखते रहो ।जब -जब आप कुछ करते भी हो तो ये ध्यान I ये है - "चिन्तयन मनसा अच्युतम"I तो कैसे करें हम - "अच्युत्तम चिन्तयन्"? कैसे कृष्ण का चिंतन करें? तो ये श्लोक में कृष्ण हैं, कृष्ण से यह श्लोक भिन्न नहीं है। तो ये श्लोकों का चिंतन करें, इसको मनसा "चिन्तयन मनसाच्युत्तम" कहते हैं। कितनी आसान बात है। एक श्लोक यदि हम आधे घंटे में कर लेते हैं, तो कितने घंटे हम खाने में, कितने घंटे हम चिंतन करने में, और कोई चीजों का, कितने घंटे हम सोने में, कितने घंटे हम इधर उधर बात करते हैं, और यह रह जाता है काम करने का। तो यदि यह नहीं करोगे तो दूसरा सब निकम्मा है।

"मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसा"। "मोघाशा - All your hopes will be baffled; मोघकर्माणो -All your activities wil lbe baffled; मोघज्ञाना - All your knowledge will be baffled; and विचेतसः - you wiĺ be completely gone insane. क्योंकि सब baffling है। ये बेचारे करते हैं - "दुकान खोली चलती नहीं, फैक्ट्री शुरू की मशीनें बिगड़ जाती हैं।आदमी मिलते नहीं। घर जाता है तो wife तंग करती हैI "खिचड़ी ***"कहांकहां देखूं मैं ,क्या करूं "? ऐसे करके तापी के किनारे आकर खड़ा रह जाता है। और किनारे खड़ा तो****"रहा क्या है तेरे पास?" तो बोले, "मेरे पास खाली ₹14000 हैंI" तो life member बन जा! छुट्टी। उसके पास जो है, वह यह निचोड़ लेता है, तो यह खुश हो जाता है। और वह बिल्कुल खाकी बाबा होकर बैठ जाता है (लाफ्टर) ये है बुरी चीज। ये न करो आप।

"चिन्तयन मनसा अच्युतम "और "प्रति अचष्ट कुरूश्रेष्ठ" - फिर देखिए, कुरुश्रेष्ठ हो गया। "द्विजागमनम " आगमनम -आने की गमन, गमन - यानी जाना go - अंग्रेजी में "go" - गमन से "go" आया है।Come -आगमन कौन? हमारा दुर्वासा!  द्विज-ब्राह्मण; ये ब्राह्मण की राह देखने लगे। कब "आगमनम्" फिर आगमनम् के बाद क्या है? "एव सः" You know आगमनम् - return of Durvasa Muni great mystic Brahman; एवं- indeed and "सः"- The King Ambrish Maharaja;  ये "द्विजागमनम्  एव स:"देखिए यह चौथी लाइन।क्या करते थे? यह किसकी राह देखते थे? द्विज - The mystic brahman and "आगमनम" - return उसके आने की राह देख रहे थे और "सः  "एव" - definitely "एव"- certainly और "सः" यानि राजा। बोलो" - द्विज (पुनरावृत्ति) आगमनम्(पुनरावृत्ति) एव(पुनरावृत्ति) सः(पुनरावृत्ति)" सारा श्लोक हमें आ गया। "इति अपः प्राश्य राजर्षि चिन्तयन मनसाच्युत्तम्" गाना है! समझ गए हैं अभी (भक्त दोहराते हैं ) "प्रत्यचष्ट  कुरूश्रेष्ठ  द्विजागमनम् एव सः"

इत्यप: प्राश्य राजर्षिश्चिन्तयन् मनसाच्युतम् ।
प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव स: ॥ 

ये vibrate करना कहते हैं। अंग्रेजी में vibrate कहते हैं।"चिन्तयन्" यह रीत है। तो हमें याद रह जाएगा। गाएँ न, तो याद रह जाएगा। (भक्त दोहराते हैं )

इत्यप: प्राश्य राजर्षिश्चिन्तयन् मनसाच्युतम् ।
प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव स: ॥ 

ये बिल्कुल Simple है । आ गया न- बोलिए :(भक्त ) very gòod "अचष्ट" तम नहीं है। with in no time, बोलिए- और कौन बोलेगा? (भक्त) अभी थोड़ा - थोड़ा बैठने लगा है मन में, तो इसको लिख ले। और सारा दिन इसको देखते रहे। आपको मतलब आ गया है। आपने शिक्षा प्राप्त कर ली है इससे। और सभी आपके पास है।

अब हम translation की तरफ जाएंगे ,ये रीत है ।This is how you should study बोलिए. Translation: O best of the Kuru dynasty, "कुरूश्रेष्ठ" का मतलब है - O best of the Kuru dynasty. देखिए वो best था Kuru dynasty का। हमारी भी dynasty है। और हमने भी इतना करना है कि we have to be the best of the dynasty और best of the dynasty, कैसे हो? कि रात दिन भगवान का नाम - चिन्तयन् मनसाच्युत्तम I यह अम्बरीश महाराजा भी, इतने अच्छे वैष्णव थे कि इनका प्रसंग भागवतम् में include किया है। नहीं तो भागवतम् में ऐसे ऐरे- गैरों का नाम नहीं देते ।ये बहुत ही अच्छे होने चाहिए इसलिए इनकी कथा भागवतम् में है। तो ऐसे हमने इन लोगों से सीख लेना है कि भई हमारा भी स्तर platform, platform must rise very high .अभी, we are on the material platform. From this material platform, we have to rise very high to the transcendental platform. और यह platform हमारा बढ़ जाए तो there is nothing like that. उसके बाद "यं प्राप्य न निवर्तन्ते" (8. 21) इसको मिला लेने के बाद वहां से कोई वापस नहीं आया। ये बात है।

देखिए और इतना मिल जाए, तो और कोई मिलने की चीज हमारे पास रहती नहीं। और सेवाएं तो हमारी चल ही रही है। आज यहां है, कल वहां है, सारी दुनिया में सेवा है। और कहीं न हो तो, कहीं आप बैठ कर चिन्तन करते रहे। द्वारिका में अभी भी ऐसा है कि आप जाएँ, आपके पास करताल हो तो "हरे कृष्ण" म॔त्र बोलते रहो, कीर्तन करते रहो, तो जिस ज़मीन पर आप बैठते हो, वो ज़मीन आपकी हो जाएगी। कोई आकर आपको compound बना देगा, कोई आकर आपको पूरीयाँ भी बना देगा। कोई चावल भी छोड़ जाएगा। अभी भी द्वारका में बड़ा easy है। कहीं भी आप बैठ जाओ। कोई न नहीं कहेगा कि क्यूँ लिया ज़मीन? क्यों तू बैठा है? यह मेरी जमीन है। नहीं! बोला, "चलो ये भगवान का नाम ले रहा है"। तो ये बात है। इतना आसान रास्ता प्रभुपाद ने हमें बता दिया, कि कहीं आप नामहट्ट का प्रोग्राम करो, तो यह सब self-generating है। लोग देखेंगे कि, "भई ये भगवान के नाम के लिए बुला रहा हैI" तो हमारे जैसे कोई दो-चार आदमी भी जमा हो जाएंगे कि "भई चलो भगवान के नाम मे साथ दें" कोई आएंगे, तो आपको प्रसाद बनाने में भी सहाय करेंगे, पैसा भी लाएंगे। यह सब self generating है। इसको कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। और इतना होने के बाद भी, वहां मदद न मिले, तो जरा बाहर निकल जाओ।" कि भई हमारा भगवान का नाम लेते हैं यह प्रोग्राम करते है, हमारे को ₹100 का पड़ता है।" तो लोग 10 ₹10 करके दे देंगे। यह बात है इतने लोग अभी भी धार्मिक हैं यहां भारत में।और गुजरात में सूरत में particularly - यह प्लीज इनकी जो generosity है, इसका हम लाभ ले ले और हमारी उन्नति कर ले।और जिनका लाभ लेकर, हम उन्नति कर रहे हैं हमारी, उनको भी उन्नति करवाएं। यह रीत है। कुछ पूछना है? हम और कह सकते हैं। We should stop here. कुछ आपको comment करना है ?

भक्त: महाराज! ये अंक और छंद कैसे गिना जाता है?

देखिए कोई भी श्लोक ले आप, देखिए 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

 तो पहली लाइन ले लीजिए "सर्व धर्मान परित्यज्य" " सर्व धर्मान प रि त् य ज् य -  कितने हुए? यह 8- 8 अक्षर है हर लाइन में। दो लाइन साथ लो तो 16 हो जाएँ । चार लाइन साथ लो तो 32 हो जाएं। ये इसका सिंपल रीत है।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (भक्त महाराज जी के बाद दोहराते हैं) तीसरी लाइन?

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति सयमी I
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।

ये सिंपल है। और इसको देखिए"इति प्रति आचष्ट राजर्षि " ये जो" प्रत्यचष्ट" है न उसको एक गिना। जो सन्धि हो जाती है, तो एक शब्द गिनते हैं। तो देखिए इसमें 1,2,3,4,5,6,7,और 8"षि" तक 8 हो जाते हैं। अब देखकर गिने।"इ त् य पः रा ज र् षि" ये 8 हो गए। यहाँ देखोगे तो अक्षर उतने ही हैं।"चि न्त य न् म न सा च् यु त म्"ऐसे 8-8 शब्द हैं। और दो लाइन में जो श्लोक हैं न, वो सब भगवद्गीता के जैसे, संस्कृत में दो लाइन और अँग्रेजी में 4 लाइन में टुकड़े कर देते हैं। और एक-एक शब्द समझ लें, हमने जैसा समझा है वैसे ही। बोलिएः

इत्यप: प्राश्य राजर्षिश्चिन्तयन् मनसाच्युतम् ।
प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव स:

बस "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम  राम राम  हरे हरे।।

संपूर्ण हो जाता है। हरी बोल। जय श्रील प्रभुपाद की जय !

Translation

Maharaj: And whatever you take from Vedas, it really gives us wisdom. Likewise there are so many shlokas in Srimad Bhagavatam and Bhagavad Gita. That is why the whole Bhagavad Gita should be in our throats - by-heart. Please start that. First we should learn the 4 seed verses (caturshloki) from 10th chapter. Verse 8,9,10 and 11 from 10th Chapter. The whole message of Gita is there in these 4 verses. So first these four verses should be learnt. When these 4 verses are done, then because we are doing devotional service, we should know what Lord Krishna is saying about devotional service. So 12th chapter has 20 shlokas. It is a small chapter. So that must be learnt by-heart. This is Vedas. After learning about devotional service, we should know what Krishna is telling about Himself. This is in 15th Chapter. That also has 20 shlokas. So please 40 shlokas from these two chapters and 4 shlokas from seed verses (caturshloki) - these verses must always be with us. Because we have changed our clothes, so whoever comes and sees us here, he would not know that we have been here for only 6 months, that we are new or neophyte. But seeing us here, he would be thinking that we are a great learned person, devotee and would ask questions. And when we speak some thing (irrelevant) he will leave his life. Because we have not done anything (study of scriptures/seva). So please..There is a very nice verse. na jār jātasya lalāt shrungam,

na jār jātasya lalāt shrungam  kule prasutasya na pāni padmam

Two things are being told in the first line. We should understand this. yadā yadā munchathi vākya bānam. The arrows of words  that come out of our mouth, munchati means when one releases the arrows of words,  (Since in Hindi teer also means river banks, Maharaj clarifies that teer he is referring to is bān) It is not teer. It is bān - the one they release from bow. Like that the arrows of words that we release from our mouth, reflects the lineage which we belong to. So that will reveal our background. Foolish person also looks good as long as he is quite. So people feel that, “See how peaceful he is. He should be a great wise man.” (Joking with a devotee Maharaj says) This gentleman is always sitting quite. Doesn’t even get up. One life-member says that, “He comes and never goes, never speaks also.” Because he doesn’t have anything to speak (laughter) So as long as he does not speak, there is no disgrace. Once he starts speaking, then “finished.”

So please see here, in the first line it is said, na jār jātasya lalāt shrungam - which means that a prostitute’s son will not have horns in his head. There is no such thing that a prostitute’s son will have horns in his forehead. lalāt means forehead. There are no horns on his forehead, by which one could recognise that he is a son of a prostitute. na jār jātasya lalāt shrungam "na" means "No." There are no horns on the forehead. kule prasutasya na pāni padmam. And if one is from a good aristocratic family, he/she does not have a lotus in her hand. There are no such symbols to reveal that he/she is from a good family. Then how to recognise? yadā yadā munchathi vākya bānam. When he opens his mouth, then it is known as to who he/she is. Whether he/she belongs to a good family or related to prostitute. The words that come out of our mouth should always be good. And how can they be good?  when we recite the verses.

Srila Prabhupada has done so much. He digested the whole Bhagavatam and whole Bhagavad-Gita and all Vedic literature. That's why he could write thousands and thousands of purports and they are very nice. In these purports we cannot reduce even a single word or add even a single word. How could he do this? And he was grhastha, so many years, he was a businessman. From where did His Divine Grace assimilate all these things? And this is a life-time service. To be grhastha is not bad. But too much attachment of grhastha is very bad. Krishna was also a very big grahasta. We are just having one wife. Krishna has 16000. He is such a big grhastha and seeing Him, we take sannyas. That is real grhasta. Ambarish Maharaj was such a great emperor. He was ruling the whole planet and he was a grhasta also. And how many things he has done! This is the point to be understood that we are already in this atmosphere. As I told you earlier, when we are are already in this atmosphere, these (scriptural topics) should come from our mouths. If we are studying the scriptures, then these things only will come out of our mouth. Whatever we think in our minds, same things will come out of our mouth. So thoughts results in words. So it works like this. First there is enlightenment in our heart. Do you understand the word “sphuran”? (enlightenment - ignition) Knowledge is enlightened in the hearts, no one is speaking. Lord also bestowed knowledge to Brahmaji - heart to heart. He did not have to take a slate and sit, nor did he need to go to a big high school or get B.A. or M.A or any teacher. Knowledge came from the heart. The medium of giving knowledge in the heart, belongs to the Supreme Lord. When it is heart-to-heart, then there is no need of speaking. This is like that.

If you go to Prabhupada and sit with him, then you will be enlightened in your heart. This is not a mental knowledge - the knowledge related to mind. It is a science. And what is not there? You know computer is there. All these are mental knowledge. In all these mental knowledge, there is speculation. And then we become very proud that, "I am a LLB, I am B.Com, I am a chartered accountant. I am a doctor."  And this thought, intoxicates you. Lord has used three words for this. mattam - this is the first word. mattam means fool. Ordinary fools are known as mattam. Then second one is pramattam, - one who is intoxicated that, “I have such a nice wife, such wonderful children, such a big bungalow, I have a big business.” This is intoxication, and this intoxication comes. A person who owns nothing, he has to drink liquor, to get intoxicated. And he becomes addicted to liquor. And a person who is intoxicated - who is pramatta, his words make no sense. Because he keeps praising himself. “I did this, I did that today.” Then our mason (kadiyaa) do you understand the word kadiyaa? You understand Gujarati right? What is the meaning for kadiyaa? -  You are sitting in Gujarat and speaking through kichdi. (laughter) Learn Gujarati. Who are referred as kadiyaa? 

Devotees: We don’t know Maharaj.

Maharaj: mimics (We don’t know Maharaj.) You are sitting in Gujarat and simply eating kichdi and don’t know anything. Who will tell now? Who are called as kadiyaa. Tell, you please tell. 

Devotee: One who repairs the house. 

Maharaj: No. not one who repairs the house. One who constructs the house, who applies the cement. Tomorrow if you also start applying cement, then you will become a mason - kadiyaa. Our masons here are quite hefty…more fat..double than you. And he does very less work. He needs two female workers also and we have to pay daily 150 Rs or 250 Rs per head. What is happening here? (laughter) Daily you are beating. So he needs two women workers. He gives them 90 Rs per head and 150 for him. So how much it amounts to? I told him. "Even if you pay me half the charges, I will apply cement all day." (laughter)  “No, no. my work is so great.”  This is the pramattam or intoxication with work. He doesn’t do any wok. But just speaks like (laughter) (Maharaj mimics like the mason)  And he keeps 8 people for work and if we go in the evening, then they would not have put cement even for 25 bricks. I told him, “What were the 8 people doing all day?” He replied, “You just lift the stone and see.” I told him, “If I could have lifted the stone, why am I employing 8 people?"  (laughter) This is pramattam. The people who do praise themselves, glorifies themselves, they come under the category of pramattam

And then comes the third type - and in Bhagavatam terms we tell that as “unmattam.”  mattam, pramattam and unmattam. (Deity curtains are opened. So Maharaj greets the Deities and lovingly talks to Them) “Jai! Jai Sri Radha Damodar ki Jai! Please keep giving us kichdi” (laughter). One who comes under unmattam category, he is insane. In English, they call such persons as insane. He is a mad person. First one is fool. Fool is fool. Second type of person is intoxicated. And he is mad for some time. But one who is unmattam, he becomes completely mad.  And in that madness what people do?  You might have seen. Even while walking on the road, they will be moving their fingers. They would be remembering how in the past, they were overseer. “How I used to order people? Keep this there. Carry this and keep it there.” Whatever work he had done in the past, he is reminded of that. By remembering these things, his loses his energy, he loses his time. Time is always working on us. And we always keep remembering that, “we did this, we did that.”  All these are signs of destruction. mattam is disastrous. Pramattam is more disastrous. And supreme disastrous thing is unmattam. May we save ourselves from these three things.  

This is what they mean by “yadā yadā munchathi vākya bānamThe words which we utter, let them be nothing else other than words from Vedic scriptures. This is taught by Ambarish Maharaj about whom we are discussing. Inspite of being such a great person, he had taken a vow that he would not speaking anything else other than Krishna.  And you might have experienced this that for all the other works, it  takes very less time. The other works that we do like, we have to do something, bring something, hang something, keep something, sell something, take something. We all keep doing these things. But these things don’t take much time. But still you see, we are all sitting here peacefully hearing about Krishna for 1 or 1.5 hrs. But for those who are shop conscious or factory conscious, for him it is not so easy to become Krishna conscious. We have to become Krishna conscious and other things we could do in no time. Such a big house is being built. It is going on. Daily it is raising high. We have been watching it. It is raising high. Not going down and some day or the other, it will be completed. We have to put in some efforts here and there.That’s it. Not more than that. But if some private man builds his house, he will become mad. One thing is he has to worry about earning money (lakshmi) for construction. And then these labourers and contractors will suck his blood. And by the time the construction is complete, he will go mad, completely mad. This yuga is very degraded. Why ? Because this building without Krishna, this is a revolution before God. Krishna did not ask us for this building. What is that? “yamunā teera vanachāri, kunja bihāri”  What do we sing? What is the last line?

Devotee: Kunjabhihāri, Gopijanavallabha Girivaradhāri.  

Maharaj: He is yamunā teera vanachāri. Why are we constructing this building? Because He is Kunja bihāri. Either He lives in the jungle or in big big palatial buildings. Only these two things are mentioned. This hut or small building is not for Him. This is His description. So whatever we build for Him, are all palatial buildings. And He builds it. We are not doing anything. And He is doing it. We are not doing it. And we are all making use of this building, because we are His family members. Someone is chanting His Names. We might have also seen that if we have some intimate servant, then we treat him like our family member. When the servant, serves, he becomes like a family member.  And he leads his whole life with us.  And it becomes our responsibility to do everything for him, to take care of him, his medical expenses, to keep him etc. Likewise if we follow Krishna, and become His faithful servant, then it becomes His responsibility that we don’t become sick, we get our clothes, food, prasadam daily. He makes all the arrangements for us. We don’t do anything. Just see, we have come here and we are having prasadam. And it does not mean that if we don’t come here, then we will die. As long as He wants to keep us alive, He will arrange for prasad somehow or the other.  We have come here. So we are getting here. If we have gone somewhere else, we would have got there. Somehow or the other He makes the arrangements. We become mad or insane and when insanity comes,  we foolishly think that, “I am giving prasad. That’s why this person is alive.” This is insane thought.  Sanity  prevails when we understand that He is giving us prasad.  We are just instruments. nimitta-mātraṁ bhava savya-sācin (BG 11.33) He is telling Arjuna, “I have already killed these people. You just become My instrument. Without you also, they are already dead.” This is internal potency of the Lord.  And when Arjuna tells the Lord, “I want to see the army - both sides, the people with whom we have to fight”, Arjun was mad at that time. He was thinking that he is fighting and he is killing. And due to that he was telling, “these people are my friends and relatives. I don’t want to kill them. I will sit down. I will give up my gāndiva bow. It is better to survive by begging than to engage in this ghastly warfare.” Then Lord made him understand that, “You are mad. Thats why you are thinking that you are doing everything.” 

We also, when our insanity increases, when our madness increases, we start thinking that we are feeding these 25 people. This is insanity. When sanity comes, then we understand the truth. Lord is known as Samanjas. We are in harmony, when we understand that everything is done by Him. "I am not doing anything." When we understand this, that is sanity. Then we never become mad. We must always be humble. 

tṛṇād api su-nīcena taror iva sahiṣṇunā
amāninā māna-dena kīrtanīyaḥ sadā hariḥ

We saw this yesterday. So when this thing happens, then we understood the meaning for water and fasting yesterday. So with that understanding we will proceed now. Now Ambarish Maharaj has drunk water and this Durvasa Muni is a great mystic. Whatever he is, he was a powerful yogi. He was incarnation of Lord Shiva. And being an incarnation of Lord Shiva, he had anger also. He used to become angry for even small things. The anger of Lord Shankar is different. But when ordinary people become angry, that is not correct. We cannot imitate Shankar. The devotees of Lord Shankar say, “I am devotee of Shankar and so I am angry.” “Arey, you took the quality of anger from Shankar. Shankarji had drunk poison for the well-being of others. Why don’t you take that?” "I am Shankar’s devotee. Please give me some poison too.” Whatever is convenient for us, we take that alone from Shankar and what we can’t do, we leave that. So we should not do like that. Please don’t imitate great personalities. Don’t try to do whatever they do. But listen to them. Shankar has given such a great wisdom, but we keep that aside and we take the pipe (used for smoking tobacco)  and try to see Shankar in the smoke. Many of them are sitting in Himalayas like this. So when we understand this, then we can understand about how Ambarish being a Vaishnava, was very humble. He was very humble. Otherwise, he being an emperor of the world, Durvasa Muni was nothing in front of him.

When Durvasa became angry Ambarish Maharaj could have imprisoned him and Durvasa would have sat squeaking in the jail. He could have done that. But he did not do that because that is not the job of a Vaishnava.  S.B-1.18.48 says, nāsya tat pratikurvanti tad-bhaktāḥ prabhavo ’pi hi. This is the teaching of Bhagavatam. nāsya tat pratikurvanti. If someone harms us, nāsya tat pratikurvanti - We do not counteract. We do not counteract and in last line, Bhagavatam says, “tad-bhaktāḥ prabhavo ’pi hi” - The Lord’s devotees, in spite of being powerful, do not counteract. Ambarish Maharaj was completely powerful. But he had digested the fact that,  nāsya tat pratikurvanti. We do not counteract anything. When we understand this and when we have this realization, then we implement this in our practical life. And in practical life, if we don’t implement these teachings, then our stay here is useless. It is better to leave this place and go and do whatever you want. (Jokingly Maharaj says) Get married to one, or two or four and invite us for doing katha and kirtan and we would come there. Keep the bundles of 500 notes ready with you. We would take the notes from you. (laughter) What is the matter? When do you want to get married. Tell me. Just tell.  

This is the thing. If you want to stay here and be in this atmosphere, then please digest this fact and after that change your life.  Otherwise there is no use of this. All these things become sense gratification. “He spoke so nice”... Once there was a nice swami in South India. And he gave a lecture in a big hall. So many great persons used to go and hear him and while coming out they said, "Swamiji talks so nicely , so nice,so nice". Then someone inquired, "What was nice about ? What did you like? "No,No Swamiji speaks so high that we couldn't understand"  (laughter). So this is not Prabhupada’s way. Prabhupada has made us sit and pointed out his fingers and made us clearly understand, “Do like that. Do like that”. Otherwise, these people did not know to eat. They used to just bite the sandwich like dogs, sleep somewhere, wakeup somewhere and never take bath and they didn’t know what they are doing. He made everyone understand, “Please do like this.” This is Bhagavata. He did not not just give lecture. This is the speciality of Srila Prabhupada. And whoever liked to stay with Prabhupada, their life is transformed. And when there is transformation in your life, then it reflects in your face. Because the effulgence of the soul, in Bhagavatam it is known as prabha. Our soul is part of the Supersoul, part and parcel of Krishna.

"mamaivāṁśo jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ" (B.G-15.7)  Atma is part and being part and parcel of Krishna, it has His qualities also. Krishna is very effulgent. Even lakhs of sun could not match the effulgence of Lord Krishna. So if we are sitting with Krishna, if Krishna is residing in your mind, day and night if you are associating with Krishna, then His effulgence is also bound to come in our body. Our faces would look better when we become completely simple, when we are very simple and without any attachment. So we don’t take tea or cofffee. “We want that only, we want this only.” Atleast with regards to eating and drinking, we have given up these wants. Whatever prasad comes in front of us, whatever morsel we get, whoever gives prasad, we take it. By doing this there has been a change in our lives. Likewise let no one hamper the effulgence of Krishna, We should not hamper it. How do we hamper it? Even while sitting here, we become greedy. “I want this, I want to do this. I want to do that.” Due to this it gets hampered. Even while sitting here our thoughts are contaminated. Due to the influence of bad thoughts, our effulgence is hampered. Due to the blessings of Kaliyug, we are lazy even while sitting here. So laziness also hampers our effulgence. So we should never sleep in brahma-muhurth. We should be particular about this.  Either here or anywhere else, we should not sleep after 4 am. Our bath and all morning duties should be completed when it is dark, before sunrise itself. This is Bhagavatam way and when this is there, then your effulgence will be bright.  Otherwise everything shows up in your face.

Face shows what we are thinking, what kind of life we are leading. Our face is the mirror. Even if we don’t tell, our face tells the truth. Your know our devotees get married, they do lagan (writing the invitation card for the wedding etc) Then we ask them. “How is your grhastha life? How is your life?" They say, “Since l have married, l am very happy.” They say loudly, “l am very happy *******”  They tell using their mouth that, “I am very happy, I am very happy.” But their face shows something else.  (laughter)  So please, somehow or the other, be sincere. We are already very fortunate that we have come here. So now let’s see. Let’s see today’s verse. Please chant lovingly.  oṁ namo bhagavate vāsudevāya

ity apaḥ prāśya rājarṣiś  cintayan manasācyutam
pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha  dvijāgamanam eva saḥ

(Maharaj recites lovingly and devotees repeat after him.)

This is 2 line shloka. This is in anushtup chand. It is in Bhagavad Gita chand. It is simple.  

ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam
pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha dvijāgamanam eva saḥ

(Maharaj and devotees recite the verse again. Correcting one of the devotees Maharaj says) Please read properly and pronounce. You are not pronouncing fully. Pronounce it properly and completely. Repeat. ity apaḥ prāśya rājarṣiś (Correcting the devotees) No. See here cintayan. Pronounce it properly. cintayan manasācyutam. No, no. you read properly? Do you read Hindi properly? You read Hindi right? Read properly. pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha dvijāgamanam eva saḥ (Devotee repeats and Maharaj corrects again) dvijāgamanam , dvijā, dvijā…ja nahin,

dvijāgamanam dvijā dvijā It is not ja "dvijāgamanam eva saḥ (Correcting a devotee Maharaj says) You are reading very fast. You are not telling . Tell jā, jādvijā.  dvijāgamanam eva saḥ We should pronounce properly. (Appreciating a devotee Maharaj says) Sir, your pronouncement is good. From which side are you coming? Are you from India? Which part of India ?

Devotee: Odisha  

Maharaj: Your pronunciation is proper. You have to practice. (Devotees repeat the verse.) He is accountant? Here they want 500Rs bundle. Later recite this bhajan. (Talking to a devotee) You are accountant right?  Or you working outside or working here? Do you go out? Why? Anyway see you. Please learn. You please see and read. iti - thus apaḥ - water, prāśya - after drinking, rājarṣiś -The great king  Ambrish. See this is one line. The verse has 4 lines. And in each line there are 8 letters. In anushtup chand there are 8 letters in 1 line. In first line, ity apaḥ prāśya 4 and rājarṣiś 4 - so total 8 letters are there. 1 line has 8 letters. So full verse has 32 letters. This Srimad Bhagavatam is such a sophisticated scripture that every letter in it is counted. You forget about the words, sentences, or verses, but every letter is counted. Such a sophisticated scripture cannot be found in any other religion in this world. No other so called religion has any scripture in which the letters are counted. This is given to us by Vyasa dev, who is literary incarnation of Krishna. He was Krishna’s incarnation, to write down the scriptures and there is no comparison for His writings in this world. Why are we leaving this great Srimad Bhagavatam and running behind some other literature? S

So what Prabhupada did is that he practised the principles of Bhagavatam in his life and then he taught us. He started this when he had no idea that he would be going to foreign countries. When he was staying in Radha Damodar temple, after taking sannyas, he decided that, “my spiritual master has asked me to teach this to English speaking world. So I will translate Srimad Bhagavatam in English.” And he was doing it till the end. Even on death-bed he was continuing this service. Srila Prabhupada has taught this to us. He gave so much importance to Srimad Bhagavatam that daily he used to get up at 1 am. Why? Because he knew that every letter is counted here. And he was so very involved in this service. In Sanskrit every word has so many meanings. But he chose the most apt one and wrote it down. And many times he used to tell us, “Please, you free us from all this administration work.” Because in his presence, there were nearly 100 temples that had come up. He was the one who knew about all the 100 temples. Others were completely inexperienced. They didn’t know anything. So Prabhupada had to take care of all matters. He had to spend so much time on administration that he was not getting time in the nights for translation. So he used to request always, “Please, somehow or other, please get ready to take care of these things.”  

And once, he decided to take Radha Krishna Deities to Sydney as Sydney temple needed Them. So he installed Radha Krishna Deities there. So when everything was over, they took a home there. Even now that is the temple. So Radha Krishna Deities - if big Deities are to be taken, then there is lot of problem in transportation. So he just took 1.5 foot tall Deities of Radha and Krishna, he placed them on his lap in the aeroplane and traveled to Sydney.  And after going there, he installed them. And now also we have the same Deities and they have made such huge altars. And on the altar they have the same small Deities like the ones we have at our homes. Then he did not have time to train the devotees about how to dress the Deities, how to bathe the Deities, how to serve Them. So he gave a small book on Deity worship to the President. And he went and prayed to the Lord, “Please forgive me. You have given me lot of service.।am not having time to stay here to train these monkeys. You please train them Yourself and You make them worship you." (laughter) Saying this he left for another place. And even now they are doing very nice worship there. Though Prabhupada could go to Australia only few times, they are following the highest worship there and what we are doing is nothing compared to theirs. These Westerners are doing such a nice first class service. If we see their three altars, we will faint. It is so gorgeous. These people are very careful. We have to learn from them about how to maintain cleanliness. They don’t like to leave anything unclean. It is in their nature to keep everything clean and tip-top. They keep only things which are needed. So we have to learn from this good quality from them and along with knowledge of Srimad Bhagavatam, we have to practise it in our life.  

So when Bhagavatam verse comes in front of us, daily we do one verse of Bhagavatam here. So you please understand word by word. Please understand the words. Don’t rush to the translation. Please have some time. If you don’t have time, then please start the class early, so that we can understand. So see in 1 line there are 1,2,3,4 words and we can easily remember these 4 words. In these 4 words, 1 or 2 words are from our own language. So it is convenient for us. These English people and other foreigners, don’t have this facility as they don’t know our languages. So they have to put more effort. But if we do little endeavour, then we can easily understand. See iti means -"like this”; apaḥ means water; water is known as apaḥ; prāśya means “after drinking” and rājarṣiś - we know they are people who are not only kings, but are also saintly. First he is a saint. Before becoming a king, he is sent to do austerities. We have Pracetas whose father Prachinabarhi was a great emperor. So he knew that, “these Pracetas would have to rule after me.” So initially he sent them to forests - “Go and wherever you find some saintly mahatma, please learn from him.  And whatever he says, please do that austerity. And then come to me. So they met Lord Shiva. So Lord Shiva inquired them, “Where are you going?” They replied, “ to do austerities.” They were unable to answer what type of austerity. They didn’t know where they are going, where they are going to sit, for how long they are going to do austerities.  - they did not know anything. “Arey, you don’t know anything and you are going?” Then they asked, “But who are you?” “Lord Shiva”. “Oh if you are Lord Shiva, then you please tell us what to do.” (laughter). So they received transcendental knowledge from Him and they went under the water, under the waters of Tapi river and performed austerities for 1000s of years.

We don’t mean that tomorrow, we also go under the Tapi river. Then  we will not get the amount for life-membership. (laughter)  This is not required, but penance is.requested. Penance is required in life and this is the greatest penance today. To chant 16 rounds properly is the greatest penance in Kali-yug. This is a great penance. We don’t know about others, but we don’t care whether we have done 16 rounds. Once we were in Amsterdam. So there was a President by name Gangadhar there. You know when I went there, he said, “Very nice. I am very busy Maharaj." I told him, “You are not doing anything. So what are you busy with?” Then he said, “I have to chant 9018 rounds yet." I told, “Why 9018?”  He said, “Daily, I keep an account, if I can’t chant and then l keep the account of not chanted rounds." Daily we have to do 16 rounds. So he does 4 rounds some day, 2 rounds some day and then 14 rounds are pending for that day. So he had accumulated 9018 rounds like this. (laughter)  Then I said, "what are you doing? " He said,  “l am sorry." Then I said, “You just go for a week and chant your rounds and then come (laughter)” There is nobody there. Only 2-3 devotees were serving and it was a small center. At least poor fellow, he was keeping account. But we don’t bother to keep account (laughter). Poor fellow, he had noted that he has to do 9018 more rounds. What we do, day has gone, forget about the rounds…ya…ya..ya. And when we go to Krishna, Krishna also says, ya..ya…yaa… (laughter)   ye yathā māṁ prapadyante (laughter) So please do this greatest penance that you chant your 16 rounds properly.

Fortunately if we are able to chant 16 rounds, then please do Bhagavad Gita and Bhagavatam. And fortunately when we have done that, then do service. Service must also be done. So all these are penance. Here there is no need to go under the Tapi river.  Otherwise your address will get changed - “under the bed of Tapi” you know? Then postman will not come there. He will drop the letter on the river itself. So please do this penance. If we don’t understand, and if we don’t do, then who will understand? If we don’t do then it will not happen. Someone would guide you that, “please do this, please do that.” There is a nice saying in Hindi, “you can take the horse to the bank of the river”  - We can take the horse to the bank of river Tapi. “But you cannot force it to drink water.” You can’t force its mouth into the river and ask it to drink. It will be like that. If he wants to drink, then only he will drink. So please don’t be that kind of horse who is standing near the banks of river and not drinking the water. We are like that horse who is standing near the water and not wanting to drink water. So please try to understand that. Please see here. Please repeat  ity apaḥ prāśya rājarṣiś (Devotees repeat after Maharaj) And now we understand that, “the saintly king drank water.”(Devotees repeat the translation) And please note the kings were known as rajarshis. As I told you, they were first saintly before becoming kings. Dhruva Maharaj also wanted to become a king. But due to harsh words of his (step)mother he went to the forest in that young age and did austerity for 6 months.

Whatever we discuss in Srimad Bhagavatam class, we have to practise it in our lives. Whatever obstacles comes in this path of penance, we have to remove that with great care and this is Kaliyug. In Kalyi yug we will have so many obstacles. And the greatest obstacle is our own mind. In Bhagavatam it is known as deergha-sutri (procrastination)  Mind tells us that, “This flower garland is lying down here. It should not be here.” So, we should remove it and keep it in a place where it has to be kept. But what we do? 25 people would be moving around. They will see that the flower garland is lying here. They will say, “Arey, who kept the garland here? Why have you kept it here?" Saying this, they will leave. Then another one will come.  “Oh let the flower garland be here”, and he also leaves. Third one comes, “Arey do you people work or not? Why is this lying down here? Please remove it.” No one will remove it. And 25 people would say, “We are doing service, we are doing service.” Arey what are you doing? Or someone else would come and say, “Oh this garland is lying here. I will remove it tomorrow. Today, let it be there as it is.” This is deergha-sutri - procrastination.

What has to be done now, what could be done in one second, we push it to next day. āj kahe mai kaal bhaju, kāl kahe phir kāl.  The service of bhajan - āj kahe mai kaal bhaju, kāl kahe phir kāl. āj kāl ke karat hi, jāsi avasar chaal (due to laziness and being driven by mind we say, "We will chant tomorrow". And when tomorrow comes in the form of today, we again postpone it to tomorrow. Like this days are passing and finally death comes and we lose the opportunity (human form of birth) which is very rarely available.)

 Please repeat. ity apaḥ prāśya rājarṣiś - We are clear with this line now. The saintly king drank some water. See how, how easy it is? Is there any difficulty? (Joking with devotees Maharaj says) Arey, why you people are hesitating to give money? I have helped you to understand this right that "nothing is free" Don’t divide. Nothing comes free. So go and keep two bundles of money ready and give two bundles to me. (laughter)  And the money should be like how it is in bank. In bundles. (laughter) All these disciples they have banks. (laughter) These people own the bank. You understood righty? 

The next line - cintayan. Now he started to think. manasā - began to think in his mind. How easy it is? Please see, cintayan manasācyutam. (Devotees repeat after Maharaj) he began to meditate on Krishna within his mind. He drank the water. So that work was over. Fast was broken. And then cintayan manasācyutam. This we have to learn from him that we do the service, but then, manasācyutam cintayan - cinta - always thinking should be on Krishna. cintayan means “thinking”, “meditating upon”  manasā" - by the mind "Achyutam” - "The Supreme Personality of Godhead”. This line is more easier than the first line. Now we have understood these two lines. Please repeat. ity apaḥ prāśya rājarṣiś

(Commenting about a devotee Maharaj says) Thief. He is a thief. Why you people are sitting with thief? He keeps seeing here. He keeps seeing there. I thought he got it by-heart.  ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam - How easy it is? Is it very difficult? Is there any difficulty? Eating kichdi is difficult. But this is more easy than that. Because eating is not our constitutional position. Because we have to bite it, we have to cook the food. Someone has to cook the food and then it comes in front of us. Then we eat and then we have to wash the vessels. The vessel in which we cooked the kichdi also has to be washed by someone. So it is a difficult job. But there is no difficulty here. ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam (Devotees repeat after Maharaj)  

Now we have got this idea in these two lines that the saintly king drank water. Using very less words, ocean of knowledge is squeezed. So much knowledge is filled in this line. ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam (Devotees repeat after Maharaj). Now what we have to learn from this? Whatever work we do, be it eating or drinking, washing clothes, taking bath or whatever service we do, then cintayan manasācyutam. We should remember these three words always. We should never forget this. Please repeat. (Maharaj makes everyone tell the verse by-heart and appreciates those who tell the verse correctly) That's right, very good (Joking with devotee who is in pant shirt and told correctly) One who is in pant-shirt, he is reciting. Why is it not coming for one who is in dhoti? Tell.

Devotee: ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam

Maharaj: Very good

Devotee: ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam

Maharaj: Very good. He is a pandit. (Devotee repeats the verse)

Maharaj: Never forget this. I will come here and beat you, if you forget this.  (Devotee repeats the verse.)

Maharaj: Jai. Please repeat. (Devotee repeats the verse)

Maharaj: ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan - within the mind manasā - Whom?

Devotee:  Acyutam.

Maharaj: Very good. Did you make the kichdi? Yes. He is not eating anything? Don’t be like this. Tell atleast one word. 

Devotee: (Explaining the reason why the other devotee is not reciting) He was in gaudiya mat

Maharaj: In Gaudiya mat, you don’t have this?

Devotee: Yes.

Maharaj:  What in Gaudiya mad, they recommend only bhajan? That is also good. But please do little bit of this also. Now, this is not Gaudiya mat. This is Prabhupada’s place. So this way, this is to be learnt.  And we must remember these three words - cintayan manasācyutam. Whatever we do - cintayan manasācyutam.  Repeat - cintayan manasācyutam. cintayan means thinking. manasā - within the mind. Acyutam - Krishna. Always remember Krishna. Always meditate on Krishna. We meditate on so many things. We meditate on money. Some people meditate on women. Some meditate on their business. Some meditate on house. Some meditate on something else. But Bhagavatam tells us - cintayan manasācyutam. Now these two lines have become clear. This is how we should study continuously and there is no difficulty in this. Only one thing is that you must have some time and peaceful mind. With peaceful mind, spend some time on this. This is your capital. What do you say for “Capital” in Hindi? (Devotee says ‘punji’) Yes. This is our punji. And if there is capital, then there is business. Without capital, how can there be business? You must have capital. You have changed to “Hare Krishna” (devotee) clothes. So looking at you people think, “he is a saintly person, he will know everything.” But as soon as the (bad) sentences come out of the mouth, people will run away. It should not be like that. Please remember that whatever yo do,"cintayan manasācyutam" - If you say one word, one line - then people will know, “Arey, he knows so many things.”  "May be you remember only these three words. But what comes, please tell that only. “My dear brother, you please do this - cintayan manasācyutam - Whatever you do, Lord has told this - cintayan manasācyutam - Within our mind, we must always think about Krishna.”  This is a great learning. Great learning for all people. And when people hear Bhagavatam, then they become very happy because this is non-different from Krishna. Bhagavatam is non-different from Krishna. So you are giving Krishna to others. And this is a very pious deed. And you will give, when you give. First you take and you become blissful.  And where Krishna is, complete knowledge and complete bliss is there. This is Krishna’s nature.  

Srila Prabhupada used to give this example that if fire is there, then there must be heat and light. Heat and light cannot be separated from fire. Likewise where there is soul, there is jnān - knowledge and ānand - bliss. Bliss is the translation for the word ānand. Remember the word bliss for ānand. Knowledge is a must and blissful - happily you be blissful. These two things are with our soul and we cannot separate it from our soul. So Bhagavatam tells that you need knowledge and you must be blissful in your life. Don’t sit with a rotten banana face. Always have a water-melon face. (referring to a devotee) Look at him. He is like water-melon. When he laughs, it is like water-melon laughing. What is the reason for ‘prasannatha’? What is the reason for cheerful nature? Why he is cheerful? The root, root cause of prasannatha or cheerfulness is - cintayan manasācyutam. This is the root cause. So this is what we learn from this line. Then we move on to third line. pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha  Repeat. pratyacaṣṭa - began to wait. He began to wait. He drank water. The saintly king drank water.  ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam - he began to meditate on Lord. And then he began to wait for the guests who had gone to take bath.  

See, how nice it is. In one word, pratyacaṣṭa - we got the third line. "And who was waiting? Kuru-śreṣṭha - Who is being referred here as kuru-śreṣṭha? “Oh best of the Kuru king” - Sukadev Goswami was narrating Bhagavatam to Maharaj Parikshit. And here Parikshit Maharaj is being referred as kuru-śreṣṭha. He was best of Kurus and what was best about him? Because his another name was Vishnurat. When he was in the womb of his mother Uttara, then Ashvattama, son of Dronacarya had released a fiery weapon on him - nuclear weapon. The nuclear weapons that are present now is not as advanced like what Pandavas had used. In those days, nuclear weapons will kill only those persons to whom they are directed. Not everyone. Now the person who released the nuclear weapon also gets killed. So he does not even release. Because if there is nuclear war, if I release nuclear weapon to kill someone, then I will also die. So now they thought, “Leave it. let him live and let me also live.”  As a result such wars are not happening now.

And one more thing that has happened in the last thirty years in this world is that, so many crores of Prabhupada’s literatures has been distributed in this world. This is a great armour against war. Because some percentage of people who are not after wealth, who are not after their nation, who are not after land, who are not after anything, they have understood that all this is like mela for two days and everything will go. Because they have realised this, wars don’t happen. There might be some small fights here and there, But nothing more than that. This is Prabhupada’s effect. Srila Prabhupada, knowingly or unknowingly - Krishna has made Prabhupada do this great service. Please let there be no quarrels in our life, no quarrels in our life. Quarrel means Kali. Whatever spiritual potency you had received in 25 years will vanish in just 2 days of fight. It is so bad. Please never let Kali enter your life.  

So Parikshit Maharaj is called Kurusreshta because when he was in his mother’s womb, Lord Vishnu circumambulated the child in the womb and protected him. And that description of Lord is very nice as to how Parikshit Maharaj saw the Lord Whose size was just like thumb-size, inside the mother’s womb. So when he was born, he was already burnt. But Krishna kept him alive. And this is not only for Parikshit Maharaj, it is for each one of us.  We all were in the mother’s womb for 9 months. After 7 months of stay, in the womb, the child becomes conscious and begins to understand. Brain becomes developed and he comes to know that, “I am lying amidst stool and urine” Stool is also warm and urine is also warm. When urine is warm, it is very uncomfortable situation for us. Our body was not like this. Our skin was completely soft and it cannot tolerate the warm urine and stool and blood and pus ..We don’t know how we could stay alive in that condition. Either the mother should have died or we should have died. Due to grace of Krishna both mother and child are alive. If we read this description in Bhagavatam, then we will not desire to take one more birth. It is so difficult situation that both mother and child could die. Or atleast one would die. Because it is such an unbearable pain. And taking so much pains, we have come in this world. And here we say “hun, hun” and waste our time. And the way we came, we just go back like that. Then again we fall into 84 lakhs of species. So for this reason, he was called kuru-śreṣṭha. And third line has only two words. What was the first one - pratyacaṣṭa - began to wait. kuru-śreṣṭha means Parikshit Maharaj.  Ambarish Maharaj tasted water. For drinking, they have nicely used the word prāśan. This word is nice. He tasted water. This is Bhagavatam’s word. And after tasting water, he began to meditate on Supreme Lord. cintayan manasācyutam and while meditating - pratyacaṣṭa he began to wait for Durvasa Muni. Because he thought after Durvasa Muni comes, we can honour prasadam with him. 

And we go to the fourth line now. So please note that this is the way to understand. So don’t we know the three lines? Come one tell me the first line. 

Devotee: ity apaḥ prāśya rājarṣiś cintayan manasācyutam pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha

Maharaj: Very good, very good - pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha. Yes..you have got it. Please tell. (Devotee repeats and Maharaj corrects the word pratyacaṣṭa. Now we are coming to the fourth line, then the verse is getting over. So when you do peacefully like this, you will get the shloka. And then what you should do, you should write down this verse in a paper. And then all day, you should keep seeing it. So whenever you are doing something else also, you please meditate on this cintayan manasācyutam -. So how to do Acyutam cintayan? How to meditate on Krishna? So Krishna is there in this verse. Krishna and this verse are non-different. So you meditate on these verses. This is known as cintayan manasācyutam. What a easy thing it is? If we do one verse in half an hour, then how much time we spend in eating, how much time we spend on meditating on other things, how much time we spend on sleeping, how much time we spend talking here and there, everything remains. If we don’t spend time for this, then everything else is incomplete.

moghāśā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vicetasaḥ  moghāśā - All your hopes will be baffled; mogha-karmāṇo - All your activities will be baffled; mogha-jñānā - All your knowledge will be baffled; and vicetasaḥ - you wiĺ be completely go insane. Because everything is baffling. It makes us helpless. He opens the shops, but it is not running. He starts a factory, but machines are under repair. He doesn't get labour.” He goes home and then wife troubles. No kichadi. “Where should I look and what should I do?” Saying this he comes and stands on the banks of Tapi river. When he standing on the bank of river Tapi, you go and ask, “What is remaining with you?” He says, “I have 14000Rs” “Ok. Then become a life-member.” Then leave. Whatever he has, this one squeezes it out and becomes happy and that other persons becomes like a Kaki Baba and sits there. (laughter) This is a bad thing. Please don’t do this. 

cintayan manasācyutam and pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha. Then see we did kuru-śreṣṭha. dvijāgamanam - āgamanam - aane ki gaman. gaman means to go. The English word “go” has come from, “gaman” Who is doing āgamanam? Our Durvasa!  dvija - brahman  He was waiting for the return of the brahman. After dvijāgamanam what is there? eva saḥ - You know āgamanam - return of Durvasa Muni, great mystic Brahman; eva - indeed and saḥ - The king Ambrish Maharaja; This is dvijāgamanam eva saḥ. See this is fourth line. What was he doing? For whom was he waiting? dvija. The mystic brahman and āgamanam - return. He was waiting for his return and eva - definitely, certainly. And saḥ means king. Tell. dvijāgamanam eva saḥ.

Now we have got the full verse. ity apaḥ prāśya rājarṣiś - cintayan manasācyutam - You have to sing. Do you understand now?  (Devotees repeat the verse.) pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha dvijāgamanam eva saḥ 

(Maharaj sings the verse lovingly and asks devotees to vibrate) This is known as vibrate in English. This is the way. Then we will be able to remember it nicely. If you sing the verses, you will remember it nicely.  

ity apaḥ prāśya rājarṣiś  cintayan manasācyutam
pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha  dvijāgamanam eva saḥ

This is very simple. (Maharaj encourages everyone to recite by-heart and appreciates) You got it right ? Very good. Sing. acaṣṭam  and not tam. Please tell. Who else will tell. Now you got this little bit in your mind. So you write it down and all day you keep looking at it. Then you will understand the meaning. This is the knowledge we have received from this verse. And everything is with you. Now we move on to the translation. This is the way. This is how you should study. Please repeat the translation.”O best of the Kuru dynasty,” The meaning of kuru-śreṣṭha is - O best of the Kuru dynasty. Please see. He (Parikshit) was the best in Kuru dynasty. We also belong to a dynasty. And we have to behave in such a way that we have to be the best of the dynasty and how to be best of the dynasty? Day and night we should do cintayan manasācyutam. This Ambarish Maharaj was also such a nice Vaishnava that his topic has been included in Srimad Bhagavatam. Otherwise they don’t include any ordinary person in Bhagavatam. He is so great and thats why his story has been included in Srimad Bhagavatam. So we have to learn from these people that our platform, platform must rise very high. Now we are on the material platform. From this material platform, we have to rise very high to the transcendental platform. And if this platform of ours rises, there is nothing like that. Then after that yaṁ prāpya na nivartante (BG 8.21) - After attaining the Supreme abode, no one returns. This is the thing.

Please see. If we get this much, then there is nothing more to be got. And our services are going on. Today we are here. Tomorrow else where. Service is there in the whole world. And if there is no service anywhere, then you just sit and keep meditating on these topics. In Dwaraka even now the situation is that, you go and if you have kartals, then you keep chanting Hare Krishna mantra, keep doing kirtans and wherever you sit, that place becomes yours. Someone will come and build the compound for you. Someone will make puris. Someone will come and leave rice. Even now it is easy in Dwaraka. You sit anywhere. No one will ask you “why you sat on this ground? This belongs to me.” No. “ok..He is chanting Krishna’s names. So let him take. This is the thing. Srila Prabhupada has given such a easy way that you do Namahatta program anywhere and it is self-generating. People will see that these people are inviting in the name of Lord and 2-4 people will gather and will think, “Come on, lets chant Lord’s names together.” Some might come and help you in doing prasadam. Some might give money. This is all self generating. No one has to make any effort for this. And even after this, if you don’t get help there, then you move out saying, "we are chanting Krishna’s name and doing programs. We spend 100Rs on these programs." Then people will contribute 10 Rs each and give you. This is the thing. Even now some people are bit religious in India. And in Gujarat, particularly in Surat, please take advantage of the people’s generosity and improve ourselves. And the people whose benefits we are taking and improving ourselves, please help them also to improve. This is the way. Do you have to ask anything? We can tell more. We should stop here. Do you want to comment?  

Devotee: Maharaj how to calculate this ank and chand?  

Maharaj: Please see, you take any shlok

sarva-dharmān parityajya 
mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja
ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo 
mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ

 So take the first line sarva-dharmān parityajya  sarva-dharmān  pa ri tya jya  How many are there? There are 8 letters in this line. If you take the second line also it will become 16. If we take 4 lines, it will become 32. This is the simple way to calculate this.

yā niśā sarva-bhūtānāṁ
tasyāṁ jāgarti saṁyamī 

What is the third line?

yā niśā sarva-bhūtānāṁ
tasyāṁ jāgarti saṁyamī
yasyāṁ jāgrati bhūtāni
sā niśā paśyato muneḥ

This is simple. And please see this - ity apaḥ prāśya rājarṣiś  - This pratyacaṣṭa we count that as one. When there is sandi (combination of letters) it is counted as 1 word. So see here in this 1,2,3,4,5,6,7 and 8 upto “shi” it becomes 8. Now we will see and count  - i t ya pah ra ja r shi  So it is 8. If you see, we have that many letters only.  ci nta ya n ma na saa ch yu ta m  - Like that we have 8-8 words (letter or akshar). And whatever 2 line shlokas are there, it is all like Bhagavad Gita verse. In Sanskrit it is in 2 lines. In English it is broken into 4 lines.  And we have to understand it word by word - just like how we did now. Please tell.

ity apaḥ prāśya rājarṣiś
cintayan manasācyutam
pratyacaṣṭa kuru-śreṣṭha
dvijāgamanam eva saḥ

We will stop here.

Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare

With this it is complete. Haribol. Jai Srila Prabhupada ki Jai !! 

Category
SB 9.10.53

We all have our Roots in Vedic Culture

Year
Location
Amsterdam

Chapter 24 - Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead

Verse 1
श्रीशुक उवाच
तस्यां विदर्भोऽजनयत् पुत्रौ नाम्ना कुशक्रथौ ।
तृतीयं रोमपादं च विदर्भकुलनन्दनम् ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca
tasyāṁ vidarbho ’janayat
putrau nāmnā kuśa-krathau
tṛtīyaṁ romapādaṁ ca
vidarbha-kula-nandanam

Verse 2
रोमपादसुतो बभ्रुर्बभ्रो: कृतिरजायत ।
उशिकस्तत्सुतस्तस्माच्चेदिश्चैद्यादयो नृपा: ॥ २ ॥
romapāda-suto babhrur
babhroḥ kṛtir ajāyata
uśikas tat-sutas tasmāc
cediś caidyādayo nṛpāḥ

Chapter 23 - The Dynasties of the Sons of Yayāti

Verse 1
श्रीशुक उवाच
अनो: सभानरश्चक्षु: परेष्णुश्च त्रय: सुता: ।
सभानरात् कालनर: सृञ्जयस्तत्सुतस्तत: ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca
anoḥ sabhānaraś cakṣuḥ
pareṣṇuś ca trayaḥ sutāḥ
sabhānarāt kālanaraḥ
sṛñjayas tat-sutas tataḥ

Verse 2
जनमेजयस्तस्य पुत्रो महाशालो महामना: ।
उशीनरस्तितिक्षुश्च महामनस आत्मजौ ॥ २ ॥
janamejayas tasya putro
mahāśālo mahāmanāḥ
uśīnaras titikṣuś ca
mahāmanasa ātmajau

Chapter 22 - The Descendants of Ajamīḍha

Verse 1
श्रीशुक उवाच
मित्रायुश्च दिवोदासाच्च्यवनस्तत्सुतो नृप ।
सुदास: सहदेवोऽथ सोमको जन्तुजन्मकृत् ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca
mitrāyuś ca divodāsāc
cyavanas tat-suto nṛpa
sudāsaḥ sahadevo ’tha
somako jantu-janmakṛt

Verse 2
तस्य पुत्रशतं तेषां यवीयान् पृषत: सुत: ।
स तस्माद् द्रुपदो जज्ञे सर्वसम्पत्समन्वित: ॥ २ ॥
tasya putra-śataṁ teṣāṁ
yavīyān pṛṣataḥ sutaḥ
sa tasmād drupado jajñe
sarva-sampat-samanvitaḥ

Chapter 21 - The Dynasty of Bharata

Verse 1
श्रीशुक उवाच
वितथस्य सुतान् मन्योर्बृहत्क्षत्रो जयस्तत: ।
महावीर्यो नरो गर्ग: सङ्‍कृतिस्तु नरात्मज: ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca
vitathasya sutān manyor
bṛhatkṣatro jayas tataḥ
mahāvīryo naro gargaḥ
saṅkṛtis tu narātmajaḥ

Verse 2
गुरुश्च रन्तिदेवश्च सङ्‍कृते: पाण्डुनन्दन ।
रन्तिदेवस्य महिमा इहामुत्र च गीयते ॥ २ ॥
guruś ca rantidevaś ca
saṅkṛteḥ pāṇḍu-nandana
rantidevasya mahimā
ihāmutra ca gīyate

Chapter 20 - The Dynasty of Pūru

Verse 1
श्रीबादरायणिरुवाच
पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि भारत ।
यत्र राजर्षयो वंश्या ब्रह्मवंश्याश्च जज्ञिरे ॥ १ ॥
śrī-bādarāyaṇir uvāca
pūror vaṁśaṁ pravakṣyāmi
yatra jāto ’si bhārata
yatra rājarṣayo vaṁśyā
brahma-vaṁśyāś ca jajñire

Verse 2
जनमेजयो ह्यभूत् पूरो: प्रचिन्वांस्तत्सुतस्तत: ।
प्रवीरोऽथ मनुस्युर्वै तस्माच्चारुपदोऽभवत् ॥ २ ॥
janamejayo hy abhūt pūroḥ
pracinvāṁs tat-sutas tataḥ
pravīro ’tha manusyur vai
tasmāc cārupado ’bhavat

Chapter 19 - King Yayāti Achieves Liberation

Verse 1
श्रीशुक उवाच
स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मन: ।
बुद्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत ॥ १ ॥
śrī-śuka uvāca
sa ittham ācaran kāmān
straiṇo ’pahnavam ātmanaḥ
buddhvā priyāyai nirviṇṇo
gāthām etām agāyata

Verse 2
श‍ृणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि ।
धीरा यस्यानुशोचन्ति वने ग्रामनिवासिन: ॥ २ ॥
śṛṇu bhārgavy amūṁ gāthāṁ
mad-vidhācaritāṁ bhuvi
dhīrā yasyānuśocanti
vane grāma-nivāsinaḥ

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